Question:

‘रूप व्यक्ति-सत्य है, नाम समाज-सत्य’ — ‘कुटज’ पाठ में लेखक इस पंक्ति के माध्यम से हमें क्या समझाना चाहता है? 
 

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यह पंक्ति अनुभव और सामाजिक मान्यता के द्वैत को स्पष्ट करती है — साहित्य में यह द्वैधता कई स्थानों पर गहराई लाती है।
Updated On: Jan 14, 2026
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Solution and Explanation

‘कुटज’ पाठ में लेखक यह दिखाता है कि किसी भी वस्तु, व्यक्ति या तत्व की पहचान दो स्तरों पर होती है — एक व्यक्ति के अनुभव द्वारा (रूप), और दूसरा समाज द्वारा स्वीकारे गए पहचान (नाम) से।
‘रूप व्यक्ति-सत्य है’ — इसका अर्थ है कि जब हम किसी वस्तु या व्यक्ति को स्वयं अनुभव करते हैं, तो वह हमारे लिए एक अलग सत्य बन जाता है। उदाहरण के लिए, लेखक जब पहाड़ों में कुटज को खिलते हुए देखता है, तो वह उसके सौंदर्य, रंग, रूप और अनुभूति से एक आत्मीय संबंध स्थापित करता है। यह उसका निजी सत्य है।
‘नाम समाज-सत्य है’ — इसका अर्थ है कि समाज उस वस्तु को किस नाम से जानता है, वह उसकी सामूहिक पहचान है। ‘कुटज’ नाम का अर्थ समाज ने तय किया है, लेकिन उसका वास्तविक रूप-रस-सुगंध व्यक्ति-विशेष के लिए अलग प्रभाव छोड़ सकता है।
इस प्रकार यह पंक्ति यह दर्शाती है कि हर वस्तु के दो स्तर होते हैं — बाहरी (सामूहिक, नाम) और आंतरिक (निजी, रूप)। लेखक चाहता है कि हम केवल नाम से नहीं, अनुभव से भी समझें — तभी किसी वस्तु की पूर्ण पहचान संभव है।
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