मन खाली नहीं रहना चाहिए, इसका मतलब यह नहीं है कि वह मन बंद रहना चाहिए। जो बंद हो जाएगा, वह शून्य हो जाएगा। शून्य होने का अधिकार बस परमात्मा का है जो सनातन भाव से संपूर्ण है। शेष सब अपूर्ण है। इससे मन बंद नहीं रह सकता। सब इच्छाओं का निरोध कर लोगे, यह झूठ है और अगर ‘इच्छानिरोधस्तप:’ का ऐसा ही नकारात्मक अर्थ हो तो वह तप झूठ है। वैसे तप की राह रेगिस्तान को जाती होगी, मोक्ष की राह वह नहीं है। ठाठ देकर मन को बंद कर रखना जड़ता है। लोभ का यह जीतना नहीं है कि जहाँ लोभ होता है, यानी मन में, वहाँ नकार हो ! यह तो लोभ की ही जीत है और आदमी की हार। आँख अपनी फोड़ डाली, तब लोभनीय के दर्शन से बचे तो क्या हुआ ? ऐसे क्या लोभ मिट जाएगा ? और कौन कहता है कि आँख फूटने पर रूप दीखना बंद हो जाएगा ? सच्चा ज्ञान सदा अपूर्णता के बोध को हम में गहरा करता है। सच्चा कर्म सदा इस अपूर्णता की स्वीकृति के साथ होता है।
गद्यांश के अनुसार ‘आँख फोड़ना’ का अभिप्राय है :
लेखक के अनुसार ‘मन को बंद कर देना’ क्यों सही नहीं है ?
गद्यांश के अनुसार ‘सच्चा ज्ञान’ किस प्रकार की भावना से प्राप्त हो सकता है ?
गद्यांश के अनुसार लोभ से बचने का क्या उपाय है ?
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
I. लोभ का नकार ही लोभ की जड़ है और यह व्यक्ति की हार है।
II. लोभ को दबाना ही उसे जीतना है।
III. संयमित मन ही लोभ पर विजय पा सकता है।
इन कथनों में से कौन-सा/कौन-से कथन सही है/हैं ?