Question:

पद्यांश पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए: "मर्त्य मानव की विजय का तुर्य हूँ मैं, उर्वशी अपने समय का सूर्य हूँ मैं। अंध, तम के भाल पर पावक जलाता हूँ, बादलों के शीस पर स्यंदन चलाता हूँ। पर न जाने बात क्या है! इंद्र का आयुध पुरुष जो झेल सकता है, सिंह से बाँहें मिलाकर खेल सकता है। फूल के आगे वही असहाय हो जाता, शक्ति के रहते हुए निरुपाय हो जाता।" (क) प्रस्तुत पद्यांश के पाठ और रचयिता का नाम लिखिए। (ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए। (ग) 'स्यंदन' व 'आयुध' शब्दों के अर्थ स्पष्ट कीजिए। (घ) प्रस्तुत पंक्तियों में कौन किसको सम्बोधित करके कह रहा है? (ङ) उपर्युक्त पंक्तियों में कौन-सा रस है?

Updated On: Sep 23, 2026
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Solution and Explanation

Step 1: पाठ और रचयिता:
'उर्वशी' शीर्षक में उर्वशी का उल्लेख तथा वीरतापूर्ण आत्म-कथन की शैली से यह अंश रामधारी सिंह 'दिनकर' रचित काव्य से प्रतीत होता है, जिसमें पुरुरवा मानवीय शक्ति और उसकी सीमाओं का वर्णन करता है (मूल पाठ्यपुस्तक से सत्यापन अनुशंसित)।

Step 2: व्याख्या:
वक्ता स्वयं को मानव-विजय का प्रतीक, अंधकार को मिटाने वाला और बादलों तक रथ चलाने वाला बताता है — यह मनुष्य की असीम शक्ति और साहस का उद्घोष है।

Step 3: शब्दार्थ:
स्यंदन = रथ; आयुध = शस्त्र/हथियार।

Step 4: सम्बोधन:
वक्ता (पुरुरवा/मानव-प्रतीक) स्वयं अपनी शक्ति और मानव-सामर्थ्य को सम्बोधित करके कह रहा है।

Final Answer:
इन पंक्तियों में वीर रस है, क्योंकि यह मानवीय पराक्रम और आत्म-गौरव की अभिव्यक्ति करती हैं।
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