Comprehension

कालिदास सौंदर्य के बाह्य आवरण को भेदकर उसके भीतर तक पहुँच सकते थे, दुख हो कि सुख, वे अपना भाव-रस उस अनासक्त कृषीवल की भाँति खींच लेते थे जो निर्दलित ईक्षुदंड से रस निकाल लेता है। कालिदास महान थे, क्योंकि वे अनासक्त रह सके थे। कुछ इसी श्रेणी की अनासक्ति आधुनिक हिंदी कवि सुमित्रानंदन पंत में है। कविवर रवींद्रनाथ में यह अनासक्ति थी। एक जगह उन्होंने लिखा – ‘राजोद्यान का सिंहद्वार कितना ही अभ्रभेदी क्यों न हो, उसकी शिल्पकला कितनी ही सुंदर क्यों न हो, वह यह नहीं कहता कि हममें आकर ही सारा रास्ता समाप्त हो गया। असल गंतव्य स्थान उसे अतिक्रम करने के बाद ही है, यही बताना उसका कर्त्तव्य है।’ फूल हो या पेड़, वह अपने-आप में समाप्त नहीं है। वह किसी अन्य वस्तु को दिखाने के लिए उठी हुई अँगुली है। वह इशारा है।

Question: 1

इस गद्यांश में किस प्रकार की अनासक्ति की बात की गई है ?

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गद्यांश में कालिदास सुख-दुख से भाव-रस खींचते हैं, पर उनमें आसक्त नहीं होते। यही अनासक्त भाव से रस ग्रहण करना है।
Updated On: Oct 27, 2026
  • सांसारिक सुखों से दूर रहने की
  • भाव-रसों को अनासक्त रूप से ग्रहण करने की
  • दुखद दृश्यों से दूर रहने की
  • सौंदर्य के बाहरी आवरण से प्रभावित होने की
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The Correct Option is B

Solution and Explanation

चरण 1: गद्यांश का संदर्भ:
यह गद्यांश हजारीप्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘शिरीष के फूल’ से लिया गया है। लेखक कालिदास, पंत और रवींद्रनाथ की अनासक्ति की बात करता है।

चरण 2: गद्यांश से प्रमाण:
गद्यांश में लिखा है कि कालिदास ‘दुख हो कि सुख, वे अपना भाव-रस उस अनासक्त कृषीवल की भाँति खींच लेते थे जो निर्दलित ईक्षुदंड से रस निकाल लेता है’। यानी कालिदास सुख-दुख में रहकर भी भाव-रस को बिना लगाव के ग्रहण कर लेते थे।

चरण 3: अन्य विकल्प:
विकल्प (1) और (3) में दूर रहने की बात है, पर गद्यांश में दूर रहने की नहीं, लगाव न रखने की बात है। विकल्प (4) कहता है कि बाहरी आवरण से प्रभावित होना, जबकि कालिदास आवरण को भेदकर भीतर पहुँचते थे।

अंतिम उत्तर:
सही विकल्प (2) – भाव-रसों को अनासक्त रूप से ग्रहण करने की।
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Question: 2

‘राजोद्यान का सिंहद्वार’ का उदाहरण देकर क्या समझाने का प्रयास किया गया है ?

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सिंहद्वार बाहरी रूप है और गंतव्य उसके पार है। इसलिए सीख है कि बाहरी सौंदर्य में न रुककर भीतरी सौंदर्य को महत्त्व दें।
Updated On: Oct 27, 2026
  • राजद्वार होने के कारण वह द्वार ही सब कुछ है।
  • वह द्वार इतना मजबूत है कि आसानी से तोड़ा नहीं जा सकता।
  • बाह्य सौंदर्य के मोह से बचते हुए आंतरिक सौंदर्य को महत्त्व देना।
  • अभ्रभेदी होने के कारण द्वार के पार नहीं जाया जा सकता।
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The Correct Option is C

Solution and Explanation

चरण 1: उदाहरण का संदर्भ:
गद्यांश में रवींद्रनाथ का कथन है कि राजोद्यान का सिंहद्वार कितना ही ऊँचा और सुंदर हो, वह यह नहीं कहता कि हम पर ही रास्ता समाप्त हो गया।

चरण 2: कथन का अर्थ:
सिंहद्वार बगीचे का प्रवेश-द्वार है। उसकी बनावट सुंदर होती है, पर असली लक्ष्य उसके पार का बगीचा है। इसी प्रकार बाहरी सौंदर्य अंतिम लक्ष्य नहीं है, उसके पार जाकर आंतरिक सौंदर्य देखना चाहिए।

चरण 3: विकल्पों की जाँच:
विकल्प (1) उलटा अर्थ देता है कि द्वार ही सब कुछ है। विकल्प (2) द्वार की मजबूती की बात करता है, जिसका गद्यांश में कोई संकेत नहीं। विकल्प (4) कहता है कि द्वार पार नहीं किया जा सकता, जबकि कथन कहता है कि गंतव्य द्वार के पार है।

अंतिम उत्तर:
विकल्प (3) – बाह्य सौंदर्य के मोह से बचते हुए आंतरिक सौंदर्य को महत्त्व देना।
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Question: 3

कालिदास की सौन्दर्य-दृष्टि कैसी थी ?

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गद्यांश की पहली पंक्ति देखिए। कालिदास बाहरी आवरण को भेदकर भीतर तक पहुँचते थे और दुख-सुख दोनों से रस लेते थे।
Updated On: Oct 27, 2026
  • स्थूल और बाहरी
  • सूक्ष्म और संपूर्ण
  • अतिक्रम और अभ्रभेदी
  • अशक्त और निर्दलित
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The Correct Option is B

Solution and Explanation

चरण 1: गद्यांश की प्रासंगिक पंक्ति:
गद्यांश की पहली पंक्ति में कहा गया है कि कालिदास सौंदर्य के बाह्य आवरण को भेदकर उसके भीतर तक पहुँच सकते थे।
वे दुख हो या सुख, दोनों में से अपना भाव-रस खींच लेते थे।

चरण 2: पंक्ति का अर्थ:
बाहरी रूप को भेदकर भीतर तक देखना सूक्ष्म दृष्टि है। दुख और सुख दोनों से रस लेना संपूर्ण दृष्टि है। इसलिए कालिदास की सौन्दर्य-दृष्टि सूक्ष्म और संपूर्ण थी।

चरण 3: अन्य विकल्पों की जाँच:
विकल्प (1) ‘स्थूल और बाहरी’ गलत है, क्योंकि कालिदास बाहरी आवरण पर रुकते नहीं थे, उसे भेदते थे।
विकल्प (3) ‘अतिक्रम और अभ्रभेदी’ शब्द रवींद्रनाथ के उद्धरण में सिंहद्वार के लिए आए हैं, कालिदास की दृष्टि के लिए नहीं।
विकल्प (4) ‘अशक्त और निर्दलित’ भी गलत है, क्योंकि ‘निर्दलित’ शब्द गन्ने के लिए आया है, कालिदास की दृष्टि के लिए नहीं।

अंतिम उत्तर:
सही उत्तर विकल्प (2) ‘सूक्ष्म और संपूर्ण’ है।
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Question: 4

‘फूल हो या पेड़, वह अपने-आप में समाप्त नहीं है’ – सिद्धांत से क्या अभिप्राय है ?

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पंक्ति के आगे लिखा है कि फूल किसी अन्य वस्तु को दिखाने वाली उठी हुई अँगुली, यानी इशारा है। इसका भाव है कि वह अंतिम लक्ष्य नहीं है।
Updated On: Oct 27, 2026
  • वे प्राकृतिक सौंदर्य को बढ़ाते हैं।
  • वे मनुष्य के जीवन से संबंधित हैं।
  • वे जीवन के असल प्रतीक हैं।
  • वे स्वयं में अंतिम नहीं होते हैं।
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The Correct Option is D

Solution and Explanation

चरण 1: संदर्भ:
यह गद्यांश हजारीप्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘शिरीष के फूल’ से लिया गया है। इसमें लेखक कालिदास, पंत और रवींद्रनाथ की अनासक्ति की बात करता है।

चरण 2: वाक्य का भाव:
गद्यांश में लिखा है कि फूल हो या पेड़, वह अपने-आप में समाप्त नहीं है। वह किसी अन्य वस्तु को दिखाने के लिए उठी हुई अँगुली है, वह इशारा है। इसका अर्थ है कि वह स्वयं अंतिम लक्ष्य नहीं है, वह उससे आगे की ओर संकेत करता है।

चरण 3: विकल्पों की जाँच:
विकल्प (1) और (2) में सौंदर्य बढ़ाने या मनुष्य के जीवन से संबंध की बात है, जो इस पंक्ति का भाव नहीं है। विकल्प (3) में ‘जीवन के असल प्रतीक’ कहा गया है, जबकि गद्यांश कहता है कि वे असल गंतव्य नहीं, केवल इशारा हैं। विकल्प (4) ‘वे स्वयं में अंतिम नहीं होते हैं’ गद्यांश के भाव से पूरी तरह मेल खाता है।

अंतिम उत्तर:
सही उत्तर विकल्प (4) है।
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Question: 5

गद्यांश के संदर्भ में ‘निर्दलित ईक्षुदंड से रस निकालने से’ क्या अभिप्राय है ?

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निर्दलित ईक्षुदंड का अर्थ कुचला हुआ गन्ना है। जैसे किसान उससे भी रस निकाल लेता है, वैसे कालिदास हर स्थिति से भीतरी भाव-रस ले लेते थे।
Updated On: Oct 27, 2026
  • सूखे हुए गन्ने से भी रस प्राप्त करना।
  • सामान्य वस्तु में भी सौंदर्य देखना।
  • असंभव को भी संभव बनाना।
  • वस्तु/व्यक्ति के भीतरी भाव-सौंदर्य को पहचानना।
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The Correct Option is D

Solution and Explanation

चरण 1: शब्दों का अर्थ:
‘निर्दलित’ का अर्थ है कुचला हुआ या पेरा हुआ। ‘ईक्षुदंड’ का अर्थ है गन्ना। इस प्रकार ‘निर्दलित ईक्षुदंड’ का अर्थ है कुचला हुआ गन्ना।

चरण 2: गद्यांश में प्रयोग:
गद्यांश कहता है कि कालिदास दुख हो या सुख, अपना भाव-रस उसी तरह खींच लेते थे जैसे अनासक्त किसान कुचले हुए गन्ने से भी रस निकाल लेता है। यहाँ गन्ने के रस की उपमा भाव-रस से दी गई है।

चरण 3: भाव:
कालिदास बाहरी रूप पर नहीं रुकते थे। वे हर व्यक्ति, वस्तु और स्थिति के भीतर छिपे भाव-सौंदर्य को पहचान लेते थे।

चरण 4: विकल्पों की जाँच:
विकल्प (1) केवल शाब्दिक अर्थ है, भाव नहीं। विकल्प (2) में सामान्य वस्तु का सौंदर्य कहा गया है, जबकि प्रसंग दुख-सुख के भाव-रस का है। विकल्प (3) असंभव को संभव करने की बात है, जो गद्यांश में नहीं है। विकल्प (4) सही अर्थ देता है।

अंतिम उत्तर:
सही उत्तर विकल्प (4) है।
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