कालिदास सौंदर्य के बाह्य आवरण को भेदकर उसके भीतर तक पहुँच सकते थे, दुख हो कि सुख, वे अपना भाव-रस उस अनासक्त कृषीवल की भाँति खींच लेते थे जो निर्दलित ईक्षुदंड से रस निकाल लेता है। कालिदास महान थे, क्योंकि वे अनासक्त रह सके थे। कुछ इसी श्रेणी की अनासक्ति आधुनिक हिंदी कवि सुमित्रानंदन पंत में है। कविवर रवींद्रनाथ में यह अनासक्ति थी। एक जगह उन्होंने लिखा – ‘राजोद्यान का सिंहद्वार कितना ही अभ्रभेदी क्यों न हो, उसकी शिल्पकला कितनी ही सुंदर क्यों न हो, वह यह नहीं कहता कि हममें आकर ही सारा रास्ता समाप्त हो गया। असल गंतव्य स्थान उसे अतिक्रम करने के बाद ही है, यही बताना उसका कर्त्तव्य है।’ फूल हो या पेड़, वह अपने-आप में समाप्त नहीं है। वह किसी अन्य वस्तु को दिखाने के लिए उठी हुई अँगुली है। वह इशारा है।
इस गद्यांश में किस प्रकार की अनासक्ति की बात की गई है ?
‘राजोद्यान का सिंहद्वार’ का उदाहरण देकर क्या समझाने का प्रयास किया गया है ?
कालिदास की सौन्दर्य-दृष्टि कैसी थी ?
‘फूल हो या पेड़, वह अपने-आप में समाप्त नहीं है’ – सिद्धांत से क्या अभिप्राय है ?
गद्यांश के संदर्भ में ‘निर्दलित ईक्षुदंड से रस निकालने से’ क्या अभिप्राय है ?