धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कहौ, जोलहा कहौ कोऊ।
काहूकी बेटी सो बेटा न ब्याहब, काहूकी जाति बिगार न सोऊ।।
तुलसी सरनाम गुलामु है राम को, जाको रुचै सो कहै कछु ओऊ।।
माँगि कै खैबौ, मसीत को सोइबो, लैबोको एकु न दैबको दोऊ।
काव्यांश का वर्ण्य विषय है –
‘काहूकी बेटी सो बेटा न ब्याहब’ – पंक्ति के माध्यम से कटाक्ष किया गया है –
तुलसीदास स्वयं को किसका दास मानते हैं ?
निम्नलिखित कथन तथा कारण को ध्यानपूर्वक पढ़कर सर्वाधिक उपयुक्त विकल्प का चयन कीजिए :
कथन : परंपरावादी एवं रूढ़िग्रस्त समाज में रहते हुए भी तुलसी निर्विकार जीवन व्यतीत कर रहे थे।
कारण : वे सामाजिक उत्तरदायित्वों से मुक्त थे।
‘लैबोको एकु न दैबको दोऊ’ – से आशय है –