लेखक और प्रकाशक एक-दूसरे के पूरक होते हैं। यदि प्रकाशक नहीं हों, तो लेखकों की कृतियों को लोक-लोचन के सम्मुख प्रस्तुत कौन करेगा और यदि लेखक नहीं हों, तो प्रकाशन के व्यवसाय की शुरुआत कैसे हो, प्रकाशक का जन्म ही कहाँ से हो ?
यह सत्य है कि मूल लेखक है और प्रकाशक उसका तना है, लेकिन तने के विस्तार को सब लोग देखते हैं और मूल की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। वह तो अधिकतर भूमिष्ठ ही रहता है। प्रकाशक की अट्टालिका, मोटर, शानशौकत अब सभी प्रमुख नगरों में हम देख सकते हैं। पर बेचारे लेखक को हम ढूँढने से ही पा सकते हैं।
इस स्वाभाविक स्थिति की विषमता लेखक और प्रकाशक के पारस्परिक सम्बन्धों में तनाव पैदा करती है। मूल और तने के बीच का तनाव कभी सुफल नहीं ला सकता। इस विषम स्थिति से निकलने के लिए दोनों को यह सोचना होगा कि सामंजस्य कैसे स्थापित हो ?
सोचना इसलिए भी जरूरी है कि कुछ लोग इस तनाव को बढ़ाने की ही दिशा में काम करते नज़र आ रहे हैं। वे लेखक से कहते हैं, देखो, तुम्हारा कितना शोषण हो रहा है, ये प्रकाशक जोंक हैं जोंक। इनसे बचो। और प्रकाशक से कहा जाता है, अजी साहब, इस लेखक को जानता कौन था ? यह तो आप हैं, जिसने इसे आसमान पर चढ़ाया !
तनाव बढ़ता जा रहा है। दोनों की हानि हो रही है। यह तनाव दोनों को चौपट कर सकता है। अत: इस पर चिंतन करना अनिवार्य है।
लेखक और प्रकाशक के बीच परस्पर कैसा संबंध है ?
प्रस्तुत गद्यांश में लेखक और प्रकाशक के बीच किस प्रकार का संबंध बताया गया है ?
निम्नलिखित कथन और कारण को ध्यानपूर्वक पढ़िए और सर्वाधिक उपयुक्त विकल्प का चयन कर लिखिए :
कथन : प्रकाशक की स्थिति लेखक से अधिक स्पष्ट है।
कारण : लेखक को ढूँढना कठिन है जबकि प्रकाशक की भौतिक समृद्धि आसानी से दिखती है।
गद्यांश के अनुसार ‘वह तो अधिकतर भूमिष्ठ ही रहता है’ – कौन भूमिष्ठ रहता है और क्यों ?
लेखक और प्रकाशक दोनों कैसे एक-दूसरे के पूरक हैं ? किन्हीं दो तर्कों द्वारा पुष्टि कीजिए।
लेखक और प्रकाशक के बीच संबंधों में सुधार किस प्रकार आ सकता है ? किन्हीं दो बिंदुओं का उल्लेख कीजिए।
लेखक और प्रकाशक के संबंधों में दूरी बढ़ने के क्या कारण हैं ? इस दूरी के बढ़ने से क्या हानि हो रही है ?