है दीप एक पर मोल सूर्य से भी भारी
है व्यक्ति एक वर्तिका, दीप धरती सारी
देखो न दुखी हो व्यक्ति, उठे इंसानी लौ,
वनखंड जलाती सिर्फ एक ही चिनगारी।
है झंझापथ, पद आहत, दीपक मद्धिम है
संघर्ष, रातकाली, मंजिल पर रिमझिम है
लेकिन पुकारता आ पहुँचा युग इंसानी
दो कदम रह गया स्वर्ग चढ़ाई अन्तिम है।
दीपक, तेरे नीचे घिर रहा अँधेरा है
सोने की चमक तले अनीति का डेरा है
तू इंसानी जीवन की रात मिटा, वरना
इंसान स्वयं बनकर आ रहा सवेरा है।
‘है दीप एक ....... सूर्य से भी भारी’ – पंक्ति का आशय है –
‘इंसानी जीवन की रात मिटा’ – से क्या अभिप्राय है ?
कॉलम-1 को कॉलम-2 से सुमेलित कीजिए और सर्वाधिक उपयुक्त विकल्प का चयन कीजिए :
| कॉलम-1 | कॉलम-2 |
|---|---|
| (क) मद्धिम दीपक | (1) लक्ष्य प्राप्ति के सीमित साधन |
| (ख) झंझापथ | (2) विपरीत परिस्थितियाँ |
| (ग) आहत पद | (3) घायल अंग |
विकल्प :
‘इंसान स्वयं सवेरे का रूप धारण कर आ रहा है’ - पंक्ति के माध्यम से किसे क्या चेतावनी दी गई है ?
‘वनखंड जलाती है एक चिनगारी’ – पंक्ति से क्या अभिप्राय है ?
‘इंसानी युग आने और स्वर्ग के दो कदम दूर रह जाने’ – से क्या आशय है ?