रात्रि की विभीषिका को सिर्फ़ पहलवान की ढोलक ही ललकारकर चुनौती देती रहती थी। पहलवान संध्या से सुबह तक, चाहे जिस ख्याल से ढोलक बजाता हो, किंतु गाँव के अर्द्धमृत, औषधि-उपचार-पथ्य-विहीन प्राणियों में वह संजीवनी शक्ति ही भरती थी। बूढ़े-बच्चे-जवानों की शक्तिहीन आँखों के आगे दंगल का दृश्य नाचने लगता था। स्पंदन-शक्ति-शून्य स्नायुओं में भी बिजली दौड़ जाती थी। अवश्य ही ढोलक की आवाज़ में न तो बुखार हटाने का कोई गुण था और न महामारी की सर्वनाश शक्ति को रोकने की शक्ति ही, पर इसमें संदेह नहीं कि मरते हुए प्राणियों को आँख मूँदते समय कोई तकलीफ़ नहीं होती थी, मृत्यु से वे डरते नहीं थे।
‘रात्रि की विभीषिका’ से अभिप्राय है :
रात्रि की विभीषिका को गाँव में कौन चुनौती देता था ?
ढोलक की आवाज़ का गाँववालों पर पड़ने वाले प्रभाव के विषय में असत्य कथन है :
गद्यांश के अनुसार गाँववालों की दीन-हीन स्थिति का प्रमुख कारण था :
‘बिजली दौड़ जाती थी’ – का आशय है :