दुनिया का सबसे बड़ा अधम –
हाँ, हाँ, दुनिया का सबसे बड़ा अधम नर वही था
जिसकी ज़बान से यह निकला था पहले-पहल –
भूमि यह मेरी है !
“भूमि यह मेरी है ?”
झूठा, मक्कार था !
असत्य, अन्याय का अवतार था !
दुनिया का सबसे बड़ा अधम !!
नीचे की धरती और ऊपर का आसमान,
पानी और पवन –
प्रकृति की देन हैं ये जीवमात्र के लिए,
इन पर है सबका अधिकार;
सबका समान अधिकार
हवा को क्या बाँटोगे ?
पानी को बाँटोगे ?
बाँटोगे नीले आसमान को ?
बाँट भी सकोगे क्या ?
धरती बेचारी बेबस थी –
पैरों के नीचे
अचल पड़ी थी, निरीह;
कह दिया –
“भूमि यह मेरी है” –
बाँट लिया टुकड़ों में,
एक मुट्ठी लोगों ने,
मानो माता के आँचल को दाँतों से चीरकर
बाँट लिया कुछ शैतान बच्चों ने;
टुकुर-टुकुर ताकते रह गए शरीफ़
रोती रही दुखिया बेचारी माँ !
दुनिया का सबसे बड़ा अधम !
इस काव्यांश का केंद्रीय भाव है :
“प्रकृति की देन हैं ये जीवमात्र के लिए” इस पंक्ति से कवि का अभिप्राय है :
“माता के आँचल को दाँतों से चीरना” इस पंक्ति का आज के संदर्भ में सटीक अर्थ क्या है ?
यदि ‘भूमि यह मेरी है’ की भावना समाज में व्याप्त नहीं होगी तो दुनिया की संरचना कैसी होगी ?
‘दुनिया का सबसे बड़ा अधम’ किसे कहा गया है और क्यों ?
‘टुकुर-टुकुर ताकते रह गए शरीफ़’ पंक्ति में किन लोगों पर व्यंग्य किया गया है और क्यों ?