Comprehension

शिरीष तरु सचमुच पक्के अवधूत की भाँति मेरे मन में ऐसी तरंगें जगा देता है जो ऊपर की ओर उठती रहती हैं। इस चिलकती धूप में इतना-इतना सरस वह कैसे बना रहता है ? क्या ये बाह्य परिवर्तन – धूप, वर्षा, आँधी, लू – अपने आप में सत्य नहीं हैं ? ......... उसके भीतर भी क्या स्थिर रहा जा सकता है ? शिरीष रह सका है। अपने देश का एक बूढ़ा रह सका था। क्यों मेरा मन पूछता है कि ऐसा क्यों संभव हुआ ? क्योंकि शिरीष भी अवधूत है। शिरीष वायुमंडल से रस खींचकर इतना कोमल और इतना कठोर है। गांधी भी वायुमंडल से रस खींचकर इतना कोमल और इतना कठोर हो सका था। मैं जब-जब शिरीष की ओर देखता हूँ तब-तब हूक उठती है – हाय, वह अवधूत आज कहाँ है !

Question: 1

शिरीष का पेड़ लेखक में कौन-सी भावना जगा देता है ?

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शिरीष अवधूत की तरह कठोर मौसम में भी सरस रहता है, यह लेखक में अजेय रहने की भावना जगाता है।
Updated On: Oct 27, 2026
  • भ्रातृत्व की
  • सद्भाव की
  • अजेय मंत्र की
  • सौंदर्य बोध की
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The Correct Option is C

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चरण 1: गद्यांश का संदर्भ:
यह गद्यांश हजारीप्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘शिरीष के फूल’ से है। लेखक लू और धूप में भी हरे-भरे और फूलों से लदे रहने वाले शिरीष की तुलना अवधूत से करता है।

चरण 2: गद्यांश की पंक्तियाँ:
गद्यांश में लिखा है – ‘शिरीष तरु सचमुच पक्के अवधूत की भाँति मेरे मन में ऐसी तरंगें जगा देता है जो ऊपर की ओर उठती रहती हैं’। लेखक पूछता है कि इतनी चिलकती धूप में वह इतना सरस कैसे रहता है।
यह शिरीष की कठिन परिस्थितियों में भी अजेय बने रहने की शक्ति की ओर संकेत है, जो लेखक को उसी तरह के जीवन-मंत्र की याद दिलाती है।

चरण 3: विकल्पों की जाँच:
भ्रातृत्व और सद्भाव की कोई बात गद्यांश में नहीं है। सौंदर्य-बोध की चर्चा भी यहाँ नहीं है, यहाँ तो कठोर मौसम में टिके रहने का भाव है।
अजेय मंत्र की भावना गद्यांश के भाव से मेल खाती है।

अंतिम उत्तर:
शिरीष का पेड़ लेखक में अजेय मंत्र की भावना जगा देता है। विकल्प 3।
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Question: 2

‘क्या ये बाह्य ... अपने आप में सत्य नहीं हैं ?’ प्रश्न के द्वारा लेखक ने किस ओर संकेत किया है ?

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लेखक कहता है कि बाहरी परिवर्तन भी सत्य हैं और उनके बीच भीतर से स्थिर रहा जा सकता है। यह कठिनाइयों को स्वीकार करने का संकेत है।
Updated On: Oct 27, 2026
  • मौसम परिवर्तन की दार्शनिक व्याख्या की ओर
  • जीवन की कठिनाइयों को स्वीकार कर सत्य की खोज की ओर
  • प्राकृतिक आपदाओं से नहीं डरने की ओर
  • प्राकृतिक आपदाओं को स्वीकार करने की ओर
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The Correct Option is B

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चरण 1: प्रसंग समझना:
यह गद्यांश हजारीप्रसाद द्विवेदी के ललित निबंध ‘शिरीष के फूल’ (आरोह भाग 2) से लिया गया है। लेखक चिलचिलाती धूप और लू में भी हरे-भरे तथा कोमल बने रहने वाले शिरीष को देखकर सोच में पड़ जाता है।

चरण 2: पंक्ति का भाव:
लेखक पूछता है कि धूप, वर्षा, आँधी और लू जैसे बाहरी परिवर्तन क्या अपने आप में सत्य नहीं हैं ? अर्थात ये जीवन की कठोर सच्चाइयाँ हैं। इसके तुरंत बाद वह कहता है कि इनके भीतर भी स्थिर रहा जा सकता है। शिरीष और अपने देश का वह बूढ़ा (गांधी) इन्हीं कठिनाइयों को स्वीकार करके भीतर से अडिग रहे।

चरण 3: सही विकल्प की जाँच:
विकल्प 2 ‘जीवन की कठिनाइयों को स्वीकार कर सत्य की खोज की ओर’ पंक्ति के भाव से मेल खाता है, क्योंकि लेखक कठिनाइयों को सत्य मानकर उनके बीच स्थिर रहने की बात कहता है।

चरण 4: अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
विकल्प 1 गलत है, क्योंकि गद्यांश में ऋतु-परिवर्तन की कोई दार्शनिक व्याख्या नहीं दी गई है। विकल्प 3 गलत है, क्योंकि प्रश्न डर के बारे में नहीं, बल्कि भीतर की स्थिरता के बारे में है। विकल्प 4 अधूरा है, क्योंकि केवल आपदाओं को स्वीकार करना लेखक का संकेत नहीं है, वह जीवन की कठिनाइयों के बीच सत्य और धैर्य की ओर संकेत करता है।

अंतिम उत्तर:
सही उत्तर विकल्प 2 है : जीवन की कठिनाइयों को स्वीकार कर सत्य की खोज की ओर।
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Question: 3

निम्नलिखित कथनों पर विचार करते हुए गद्यांश के अनुसार सही कथन को चयनित कर लिखिए :

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गद्यांश में शिरीष को पक्का अवधूत कहा गया है, जो कठिन परिस्थितियों में भी धीर और स्थिर रहता है। इसलिए धीरता वाला कथन सही है।
Updated On: Oct 27, 2026
  • ‘शिरीष’ जिजीविषा और तुमुल कोलाहल-कलह के बीच धीरता का परिचायक है।
  • ‘शिरीष’ प्रतिकूल परिस्थितियों में विचलित हो जाता है।
  • ‘शिरीष’ युद्ध की स्थिति में सहनशक्ति खो देता है।
  • ‘शिरीष’ विपरीत समय में हतोत्साहित हो जाता है।
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The Correct Option is A

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चरण 1: गद्यांश का सार:
गद्यांश में लेखक बताता है कि शिरीष चिलकती धूप, वर्षा, आँधी और लू में भी सरस बना रहता है। वह अवधूत की तरह हर परिस्थिति में स्थिर और धीर रहता है।

चरण 2: विकल्प 1 की जाँच:
विकल्प 1 कहता है कि शिरीष जिजीविषा और कोलाहल-कलह के बीच धीरता का परिचायक है। गद्यांश की पंक्ति ‘शिरीष रह सका है’ और ‘इतना-इतना सरस वह कैसे बना रहता है’ इसी धीरता और जीने की इच्छा को दिखाती है। इसलिए यह कथन सही है।

चरण 3: शेष विकल्प क्यों गलत हैं:
विकल्प 2 कहता है कि शिरीष प्रतिकूल परिस्थितियों में विचलित हो जाता है, जबकि गद्यांश के अनुसार वह कठिनाइयों में भी स्थिर रहता है। विकल्प 3 में युद्ध की स्थिति में सहनशक्ति खोने की बात है, जो गद्यांश में कहीं नहीं है और शिरीष के स्वभाव के उलट है। विकल्प 4 में हतोत्साहित होने की बात है, जबकि शिरीष को लेखक ‘पक्का अवधूत’ कहता है।

अंतिम उत्तर:
सही कथन विकल्प 1 है।
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Question: 4

गद्यांश में शिरीष, गांधी जी और अवधूत तीनों का उल्लेख हुआ है, तीनों में क्या समानता थी ?

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गद्यांश में शिरीष, अवधूत और गांधी तीनों को वायुमंडल से रस खींचकर कोमल और कठोर बताया गया है। यही उनकी दृढ़ता की समानता है।
Updated On: Oct 27, 2026
  • तीनों ने अपना जीवन परोपकार में बिताया।
  • तीनों को समाज में लोकप्रियता प्राप्त थी।
  • परिस्थिति के अनुरूप स्वयं को ढालकर स्वभाव से दृढ़ रहे।
  • सभी ने सामाजिक जीवन का बहिष्कार किया।
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The Correct Option is C

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चरण 1: गद्यांश में तीनों का उल्लेख:
गद्यांश में कहा गया है कि शिरीष अवधूत है, वह वायुमंडल से रस खींचकर इतना कोमल और इतना कठोर है। फिर कहा गया है – ‘गांधी भी वायुमंडल से रस खींचकर इतना कोमल और इतना कठोर हो सका था।’

चरण 2: समानता खोजना:
तीनों के बारे में मुख्य बात यह है कि वे बाहर की कठिन परिस्थितियों से रस लेकर भी भीतर से दृढ़ रहे। वे परिस्थिति के अनुसार स्वयं को ढालते हैं, पर अपना स्वभाव नहीं छोड़ते।

चरण 3: सही विकल्प:
विकल्प 3 ‘परिस्थिति के अनुरूप स्वयं को ढालकर स्वभाव से दृढ़ रहे’ इसी बात को कहता है, इसलिए यह सही है।

चरण 4: गलत विकल्प:
विकल्प 1 में परोपकार में जीवन बिताने की बात है, जो गद्यांश में नहीं कही गई। विकल्प 2 में लोकप्रियता की बात है, जो शिरीष पर लागू ही नहीं होती। विकल्प 4 में सामाजिक जीवन का बहिष्कार है, जबकि गांधी समाज के बीच रहे।

अंतिम उत्तर:
सही उत्तर विकल्प 3 है।
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Question: 5

गद्यांश का केंद्रीय भाव है :

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कोमल दिखने वाले शिरीष और गांधी दोनों भीतर से कठोर रहे। इसलिए गद्यांश का भाव आत्मबल की श्रेष्ठता है।
Updated On: Oct 27, 2026
  • प्रेम का मोह से श्रेष्ठ होना
  • समानता का असमानता से श्रेष्ठ होना
  • आत्मबल का देहबल से श्रेष्ठ होना
  • सत्य का असत्य भाव से श्रेष्ठ होना
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The Correct Option is C

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चरण 1: गद्यांश के विचार:
गद्यांश में शिरीष को अवधूत कहा गया है, जो गर्मी, लू और आँधी में भी सरस रहता है। लेखक उसकी तुलना गांधी से करता है, जो शरीर से दुर्बल होकर भी अपने मन की दृढ़ता से देश को दिशा दे सके।

चरण 2: केंद्रीय भाव निकालना:
बाहर की कठिनाइयाँ शरीर और जीवन पर चोट करती हैं, पर जिसका भीतर का बल (आत्मबल) मज़बूत है वह नहीं टूटता। शिरीष और गांधी दोनों में यही आत्मबल दिखता है।

चरण 3: विकल्पों की जाँच:
विकल्प 3 ‘आत्मबल का देहबल से श्रेष्ठ होना’ इसी भाव को बताता है, इसलिए सही है। विकल्प 1 में प्रेम और मोह की तुलना है, जो गद्यांश में नहीं है। विकल्प 2 में समानता-असमानता की बात का कोई प्रसंग नहीं है। विकल्प 4 में सत्य-असत्य की तुलना है, पर गद्यांश का मूल विषय भीतर की स्थिरता और दृढ़ता है।

अंतिम उत्तर:
सही उत्तर विकल्प 3 है : आत्मबल का देहबल से श्रेष्ठ होना।
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