शिरीष तरु सचमुच पक्के अवधूत की भाँति मेरे मन में ऐसी तरंगें जगा देता है जो ऊपर की ओर उठती रहती हैं। इस चिलकती धूप में इतना-इतना सरस वह कैसे बना रहता है ? क्या ये बाह्य परिवर्तन – धूप, वर्षा, आँधी, लू – अपने आप में सत्य नहीं हैं ? ......... उसके भीतर भी क्या स्थिर रहा जा सकता है ? शिरीष रह सका है। अपने देश का एक बूढ़ा रह सका था। क्यों मेरा मन पूछता है कि ऐसा क्यों संभव हुआ ? क्योंकि शिरीष भी अवधूत है। शिरीष वायुमंडल से रस खींचकर इतना कोमल और इतना कठोर है। गांधी भी वायुमंडल से रस खींचकर इतना कोमल और इतना कठोर हो सका था। मैं जब-जब शिरीष की ओर देखता हूँ तब-तब हूक उठती है – हाय, वह अवधूत आज कहाँ है !
शिरीष का पेड़ लेखक में कौन-सी भावना जगा देता है ?
‘क्या ये बाह्य ... अपने आप में सत्य नहीं हैं ?’ प्रश्न के द्वारा लेखक ने किस ओर संकेत किया है ?
निम्नलिखित कथनों पर विचार करते हुए गद्यांश के अनुसार सही कथन को चयनित कर लिखिए :
गद्यांश में शिरीष, गांधी जी और अवधूत तीनों का उल्लेख हुआ है, तीनों में क्या समानता थी ?
गद्यांश का केंद्रीय भाव है :