तिरती है समीर-सागर पर
अस्थिर सुख पर दुख की छाया –
जग के दग्ध हृदय पर
निर्दय विप्लव की प्लावित माया –
यह तेरी रण-तरी
भरी आकांक्षाओं से,
घन, भेरी-गर्जन से सजग सुप्त अंकुर
उर में पृथ्वी के, आशाओं से
नवजीवन की, ऊँचा कर सिर,
ताक रहे हैं, ऐ विप्लव के बादल !
पृथ्वी में सोए हुए अंकुरों पर किसका प्रभाव पड़ता है ?
प्रस्तुत काव्यांश में कवि बादलों के विप्लवकारी रूप का आह्वान क्यों कर रहा है ?
‘सुप्त अंकुर’ का प्रयोग किस भावना/प्रक्रिया को प्रकट करता है ?
‘प्लावित माया’ को किस संदर्भ में प्रयुक्त किया गया है ?
‘घन, भेरी-गर्जन’ से कवि ने किसका बोध कराया है ?