जो नहीं हो सके पूर्ण-काम
मैं उनको करता हूँ प्रणाम
कुछ कुंठित औ' कुछ लक्ष्य-भ्रष्ट
जिनके अभिमंत्रित तीर हुए;
रण की समाप्ति के पहले ही
जो वीर रिक्त तूणीर हुए !
– उनको प्रणाम !
जो छोटी-सी नैया लेकर
उतरे करने को उदधि-पार;
मन की मन में ही रही, स्वयं
हो गए उसी में निराकार !
– उनको प्रणाम !
जो उच्च शिखर की ओर बढ़े
रह-रह नव-नव उत्साह भरे;
पर कुछ ने ले ली हिम-समाधि
कुछ असफल ही नीचे उतरे !
– उनको प्रणाम !
एकाकी और अकिंचन हो
जो भू-परिक्रमा को निकले;
हो गए पंगु, प्रति-पद जिनके
इतने अदृष्ट के दाव चले !
– उनको प्रणाम !
कृत-कृत्य नहीं जो हो पाए;
प्रत्युत फाँसी पर गए झूल
कुछ ही दिन बीते हैं, फिर भी
यह दुनिया जिनको गई भूल
– उनको प्रणाम !
‘रिक्त तूणीर’ होने का अभिप्राय है –
काव्यांश में ‘हिम समाधि’ शब्द का प्रयोग किस अर्थ में हुआ है ?
‘छोटी-सी नैया’ और ‘उदधि-पार’ का प्रतीकार्थ है –
कवि किन लोगों को प्रणाम कर रहा है ?
‘हो गए उसी में निराकार’ कथन का क्या तात्पर्य है ? काव्यांश के आधार पर लिखिए।
कवि के अनुसार प्रतिकूल परिस्थितियों में संघर्ष करने के बाद भी दुनिया उन लोगों को क्यों भूल गई ?