Comprehension

सबकी पीड़ा के साथ व्यथा अपने मन की जो जोड़ सके,

मुड़ सके जहाँ तक समय, उसे निर्दिष्ट दिशा में मोड़ सके।

युगपुरुष वही सारे समाज का विहित धर्मगुरु होता है,

सबके मन का जो अंधकार अपने प्रकाश से धोता है।

थे जहाँ सहस्रों वर्ष पूर्व, लगता है वहीं खड़े हैं हम,

है वृथा वर्ग उन गुफावासियों से कुछ बहुत बड़े हैं हम।

अनगढ़ पत्थर से लड़ो, लड़ो किटकिटा नखों से, दाँतों से

या लड़ो ऋक्ष के रोमगुच्छ-पूरित वज्रीकृत हाथों से।

या चढ़ विमान पर नर्म मुट्ठियों से गोलों की वृष्टि करो

आ जाय लक्ष्य में जो कोई, निष्ठुर हो सबके प्राण हरो।

ये तो साधन के भेद, किन्तु भावों में तत्त्व नया क्या है ?

क्या खुली प्रेम आँख अधिक ? भीतर कुछ बढ़ी दया क्या है ?

झर गई पूँछ, रोमान्त झरे, पशुता का झरना बाकी है,

बाहर-बाहर तन सँवर चुका, मन अभी सँवरना बाकी है।

Question: 1

कवि को ऐसा क्यों लगता है कि हम सहस्रों वर्ष पूर्व जहाँ थे, आज भी वहीं हैं ?

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अंतिम दो पंक्तियाँ देखिए। उनमें कवि कहता है कि पशुता का झरना अभी बाकी है।
Updated On: Oct 27, 2026
  • धरती के भीतर का रहस्य जानना अभी भी बाकी है।
  • मानव के भीतर पशुता अभी भी शेष है।
  • आज भी मनुष्य अपने नाखूनों का बढ़ना नहीं रोक पाया है।
  • आज भी मनुष्य नख-दंत अवलम्बी है।
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The Correct Option is B

Solution and Explanation

चरण 1: प्रसंग समझना:
कविता में कवि कहता है: ‘थे जहाँ सहस्रों वर्ष पूर्व, लगता है वहीं खड़े हैं हम’। अर्थात हजारों वर्ष बाद भी हम वहीं खड़े हैं, इसका कारण आगे की पंक्तियों में है।

चरण 2: कविता का कारण खोजना:
कवि कहता है कि हथियार बदले हैं, पर भाव नहीं बदला। पहले मनुष्य पत्थर, नाखून और दाँतों से लड़ता था, अब विमान से गोले बरसाता है।
अंतिम पंक्ति में वह स्पष्ट लिखता है: ‘झर गई पूँछ, रोमान्त झरे, पशुता का झरना बाकी है’। यानी मनुष्य के भीतर पशुता अभी शेष है।

चरण 3: विकल्पों की जाँच:
विकल्प 1 में धरती के रहस्य की बात है, जो कविता में नहीं है।
विकल्प 3 में नाखून बढ़ने की बात है, जो कविता का विषय नहीं है।
विकल्प 4 नख-दंत की बात करता है, परंतु कवि का कारण केवल अस्त्र नहीं, भीतर की पशुता है।
विकल्प 2 पंक्ति के भाव से पूरी तरह मेल खाता है।

अंतिम उत्तर:
विकल्प 2: मानव के भीतर पशुता अभी भी शेष है।
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Question: 2

‘ये तो साधन के भेद’ – पंक्ति में ‘साधन’ से आशय है :

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इन पंक्तियों से पहले पत्थर, नाखून, दाँत और विमान से लड़ने की बात है। यही साधन हैं।
Updated On: Oct 27, 2026
  • जीवनयापन के साधन
  • लक्ष्य प्राप्ति के अस्त्र-शस्त्र
  • जीविकोपार्जन के माध्यम
  • शत्रु को भयभीत करने के तरीके
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The Correct Option is B

Solution and Explanation

चरण 1: पंक्ति का संदर्भ:
पंक्ति से पहले कवि लड़ाई के तरीके गिनाता है: अनगढ़ पत्थर से लड़ो, नाखूनों और दाँतों से लड़ो, या विमान पर चढ़कर नर्म मुट्ठियों से गोलों की वृष्टि करो। इनके तुरंत बाद लिखा है: ‘ये तो साधन के भेद’।

चरण 2: ‘साधन’ का अर्थ:
यहाँ पत्थर, नख, दाँत, विमान और गोले, सब लक्ष्य को पाने या शत्रु को मारने के औज़ार हैं। कवि कहता है कि ये केवल औज़ारों के भेद हैं, भाव वही है।
इसलिए ‘साधन’ का आशय लक्ष्य प्राप्ति के अस्त्र-शस्त्र से है।

चरण 3: अन्य विकल्पों को हटाना:
विकल्प 1 और 3 जीवनयापन और आजीविका की बात करते हैं, जो प्रसंग में नहीं है।
विकल्प 4 शत्रु को भयभीत करने के तरीके कहता है, पर कविता में डराने की नहीं, मारने और लड़ने की बात है।

अंतिम उत्तर:
विकल्प 2: लक्ष्य प्राप्ति के अस्त्र-शस्त्र।
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Question: 3

‘बाहर-बाहर तन सँवर चुका’ – से क्या अभिप्राय है ?

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तन का सँवरना यानी शरीर का निखरना। अगली बात में कवि मन के न सँवरने की तुलना करता है।
Updated On: Oct 27, 2026
  • सौंदर्य प्रसाधनों से शारीरिक सुंदरता का बढ़ जाना
  • शरीर के अनावश्यक अंगों का झड़ जाना
  • मनुष्य की शारीरिक बनावट का सुंदर हो जाना
  • मनुष्य और पशुओं के बीच अंतर दृष्टिगत होना
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The Correct Option is C

Solution and Explanation

चरण 1: पंक्ति का प्रसंग:
कवि कहता है: ‘झर गई पूँछ, रोमान्त झरे, पशुता का झरना बाकी है, बाहर-बाहर तन सँवर चुका, मन अभी सँवरना बाकी है।’ यहाँ तन और मन की तुलना की गई है।

चरण 2: पंक्ति का अर्थ:
‘तन सँवरना’ का अर्थ है शरीर का परिष्कृत और सुंदर हो जाना। मनुष्य का शरीर आदिम अवस्था से बदलकर आज की सभ्य और सुगठित बनावट तक पहुँच गया है।
‘बाहर-बाहर’ का अर्थ है कि यह परिवर्तन केवल ऊपरी है और भीतर का मन अब भी वैसा ही है।

चरण 3: विकल्पों की जाँच:
विकल्प 1 सौंदर्य प्रसाधनों की बात करता है, जिसका कविता में कोई संकेत नहीं है।
विकल्प 2 पूँछ और रोम के झड़ने की ओर संकेत करता है, पर यह पिछली पंक्ति का भाव है; ‘तन सँवर चुका’ का समग्र अर्थ शारीरिक बनावट का निखरना है।
विकल्प 4 में मनुष्य और पशु के अंतर की बात है, जबकि कवि कहता है कि भीतर से पशुता अब भी शेष है।
विकल्प 3 पंक्ति का सीधा और सही अर्थ देता है।

अंतिम उत्तर:
विकल्प 3: मनुष्य की शारीरिक बनावट का सुंदर हो जाना।
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Question: 4

‘भावों में तत्त्व नया क्या है’ – पंक्ति में निहित व्यंग्य स्पष्ट कीजिए।

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पंक्ति के आगे-पीछे की पंक्तियाँ देखिए। साधन बदले हैं, पर मनुष्य के भाव (दया, प्रेम) नहीं बदले, यही व्यंग्य है।
Updated On: Oct 27, 2026
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चरण 1: काव्यांश का संदर्भ समझिए:
यह अपठित काव्यांश युगपुरुष की पहचान बताता है और फिर आज के मनुष्य की स्थिति पर प्रश्न उठाता है।
कवि कहता है कि हज़ारों वर्ष पहले हम जहाँ थे, लगता है आज भी वहीं खड़े हैं।
आदिम गुफावासी पत्थर, नाखून और दाँतों से लड़ते थे और आज का मनुष्य विमान से गोले बरसाता है।

चरण 2: पंक्ति का आशय देखिए:
कवि कहता है, ‘ये तो साधन के भेद, किन्तु भावों में तत्त्व नया क्या है ?’
अर्थात लड़ने के साधन बदले हैं, पर लड़ने के पीछे का भाव कहाँ बदला है ?
प्रेम, दया और करुणा जैसे भाव पहले जितने कम थे, आज भी उतने ही कम हैं।

चरण 3: व्यंग्य स्पष्ट कीजिए:
व्यंग्य यह है कि मनुष्य स्वयं को सभ्य, आधुनिक और विकसित मानता है, पर उसकी निष्ठुरता और हिंसा की प्रवृत्ति आदिम मनुष्य जैसी ही है।
वैज्ञानिक उन्नति केवल हथियारों तक सीमित रही, मन की उन्नति नहीं हुई।
इस प्रकार कवि मनुष्य के सभ्यता-संबंधी दंभ पर चोट करता है।

अंतिम उत्तर:
इस पंक्ति में यह व्यंग्य है कि साधन आधुनिक हो गए, पर मनुष्य के भाव अब भी हिंसक और निष्ठुर हैं, इसलिए उसकी तथाकथित प्रगति खोखली है।
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Question: 5

‘मन अभी सँवरना बाकी है’ – कवि ने ऐसा क्यों कहा है ?

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‘बाहर-बाहर तन सँवर चुका’ से तुलना कीजिए। तन बदला है, पर मन की पशुता (क्रूरता) अभी नहीं गई है।
Updated On: Oct 27, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: पंक्ति का स्थान देखिए:
‘मन अभी सँवरना बाकी है’ काव्यांश की अंतिम पंक्ति है।
इसके ठीक पहले कवि कहता है, ‘झर गई पूँछ, रोमान्त झरे, पशुता का झरना बाकी है, बाहर-बाहर तन सँवर चुका’।

चरण 2: बाहरी और भीतरी बदलाव में अंतर कीजिए:
बाहर से मनुष्य बहुत बदल गया है। उसकी पूँछ और शरीर के बाल झड़ चुके हैं, वह कपड़े पहनता है और विमान तक बना चुका है।
परंतु उसके भीतर की क्रूरता, निष्ठुरता और हिंसा की प्रवृत्ति अब भी नहीं गई है।
काव्यांश में पूछा गया है कि क्या आँख में प्रेम और भीतर दया कुछ बढ़ी है ? उत्तर नहीं है।

चरण 3: कारण लिखिए:
कवि के अनुसार सच्चा विकास तन का नहीं, मन का होता है।
जब तक मन से पशुता नहीं झड़ती और उसमें दया, करुणा और संवेदना नहीं आती, तब तक मनुष्य का संस्कार अधूरा है।
इसीलिए कवि ने कहा कि मन अभी सँवरना बाकी है।

अंतिम उत्तर:
कवि ने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि मनुष्य का रूप-रंग और साधन तो बदल गए, पर उसके मन की पशुता, यानी क्रूरता और निष्ठुरता, अभी समाप्त नहीं हुई है।
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Question: 6

वज्रीकृत हाथों से या नर्म मुट्ठियों से लड़ना कवि की दृष्टि में एक समान क्यों है ?

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‘साधन के भेद’ वाली पंक्ति देखिए। साधन अलग हैं, पर दोनों में प्राण हरने की निष्ठुरता समान है।
Updated On: Oct 27, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: दोनों स्थितियों को पहचानिए:
काव्यांश में कवि ने दो तरह की लड़ाई बताई है।
पहली, ‘ऋक्ष के रोमगुच्छ-पूरित वज्रीकृत हाथों से’ लड़ना, यानी आदिम काल की कठोर और सीधी लड़ाई।
दूसरी, ‘विमान पर नर्म मुट्ठियों से गोलों की वृष्टि’ करना, यानी आधुनिक काल की यांत्रिक लड़ाई।

चरण 2: दोनों में समानता खोजिए:
दोनों ही स्थितियों में कवि के शब्दों में लक्ष्य में जो आए, उसके ‘निष्ठुर’ होकर प्राण हर लिए जाते हैं।
दोनों में उद्देश्य एक है, दूसरे को मारना या नष्ट करना।
अंतर केवल साधन का है, जैसा कवि ने कहा, ‘ये तो साधन के भेद’।

चरण 3: कवि की दृष्टि लिखिए:
कवि भावों को देखता है, साधनों को नहीं। दोनों लड़ाइयों के पीछे वही हिंसा और निष्ठुरता है।
इसलिए हाथों की कठोरता हो या मुट्ठियों की कोमलता, परिणाम एक जैसा विनाश है।

अंतिम उत्तर:
कवि की दृष्टि में दोनों समान हैं क्योंकि साधन भले बदल गए हों, दोनों में निष्ठुरता और दूसरों के प्राण लेने का भाव समान है।
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