सबकी पीड़ा के साथ व्यथा अपने मन की जो जोड़ सके,
मुड़ सके जहाँ तक समय, उसे निर्दिष्ट दिशा में मोड़ सके।
युगपुरुष वही सारे समाज का विहित धर्मगुरु होता है,
सबके मन का जो अंधकार अपने प्रकाश से धोता है।
थे जहाँ सहस्रों वर्ष पूर्व, लगता है वहीं खड़े हैं हम,
है वृथा वर्ग उन गुफावासियों से कुछ बहुत बड़े हैं हम।
अनगढ़ पत्थर से लड़ो, लड़ो किटकिटा नखों से, दाँतों से
या लड़ो ऋक्ष के रोमगुच्छ-पूरित वज्रीकृत हाथों से।
या चढ़ विमान पर नर्म मुट्ठियों से गोलों की वृष्टि करो
आ जाय लक्ष्य में जो कोई, निष्ठुर हो सबके प्राण हरो।
ये तो साधन के भेद, किन्तु भावों में तत्त्व नया क्या है ?
क्या खुली प्रेम आँख अधिक ? भीतर कुछ बढ़ी दया क्या है ?
झर गई पूँछ, रोमान्त झरे, पशुता का झरना बाकी है,
बाहर-बाहर तन सँवर चुका, मन अभी सँवरना बाकी है।
कवि को ऐसा क्यों लगता है कि हम सहस्रों वर्ष पूर्व जहाँ थे, आज भी वहीं हैं ?
‘ये तो साधन के भेद’ – पंक्ति में ‘साधन’ से आशय है :
‘बाहर-बाहर तन सँवर चुका’ – से क्या अभिप्राय है ?
‘भावों में तत्त्व नया क्या है’ – पंक्ति में निहित व्यंग्य स्पष्ट कीजिए।
‘मन अभी सँवरना बाकी है’ – कवि ने ऐसा क्यों कहा है ?
वज्रीकृत हाथों से या नर्म मुट्ठियों से लड़ना कवि की दृष्टि में एक समान क्यों है ?