फूल से बोली कली क्यों व्यस्त मुरझाने में है
फ़ायदा क्या गंध औ मकरंद बिखराने में है
तूने अपनी उम्र क्यों वातावरण में घोल दी
अपनी मनमोहक पँखुरियों की छटा क्यों खोल दी
तू स्वयं को बाँटता है जिस घड़ी से तू खिला
किन्तु इस उपकार के बदले में तुझको क्या मिला
मुझको देखो मेरी सब खुशबू मुझ ही में बंद है
मेरी सुंदरता है अक्षय अनछुआ मकरंद है
मैं पली काँटों में जब थी दुनिया तब सोती रहीं
मेरी ही क्या ये कभी किसी की भी कभी होती नहीं
ऐसी दुनिया के लिए सौरभ लुटाऊँ किसलिए
स्वार्थी समुदाय का मेला लगाऊँ किसलिए
फूल उस नादान की वाचालता पर चुप रहा
फिर स्वयं को देखकर भोली कली से ये कहा
ज़िंदगी सिद्धांत की सीमाओं में बँटती नहीं
ये वो पूँजी है जो व्यय से बढ़ती है घटती नहीं
फूल और कली के संवाद के माध्यम से कवि ने स्पष्ट किया है :
काव्यांश के अनुसार कौन-सी पूँजी बाँटने से बढ़ती है ?
काव्यांश के संदर्भ में ‘वाचालता’ शब्द का अर्थ है :
कली और फूल के व्यक्तित्व में क्या अंतर है ?
कली अपना सौंदर्य और महक किसी के साथ क्यों नहीं बाँटना चाहती ?
कली अथवा फूल, आप किसके विचारों से सहमत हैं ? तर्कपूर्ण उत्तर दीजिए।