Question:

निम्नलिखित पंक्तियों में से किसी एक की सप्रसंग व्याख्या कीजिए:

“हरगोविन भाई, तुमको एक संवाद ले जाना है। आज ही। बोलो, जाओगे न?” 
“कहाँ?” 
“मेरी माँ के पास।” 
हरगोविन बड़ी बहुरिया की छलछलाई आँखों में डूब गया, “कहिए, क्या संवाद है?” 
संवाद सुनाते समय बड़ी बहुरिया सिसकने लगी। हरगोविन की आँखें भी भर आईं। 
बड़ी हवेली की लक्ष्मी को पहली बार इस तरह सिसकते देखा है हरगोविन ने। 
वह बोला, “बड़ी बहुरिया, दिल को कड़ा कीजिए।” 
“और कितना कड़ा करूँ दिल?... माँ से कहना, मैं भाई-भाभियों की नौकरी करके पेट पालूँगी। 
बच्चों की जूठन खाकर एक कोने में पड़ी रहूँगी, लेकिन यहाँ अब नहीं... अब नहीं रह सकूँगी। 
कहना, यदि माँ मुझे यहाँ से नहीं ले जाएगी तो मैं किसी दिन गढ़ा बाँधकर पोखरे में डूब मरूँगी... 
बघेला-साग खाकर कब तक जीऊँ? किसलिए... किसके लिए?”

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सप्रसंग व्याख्या करते समय पात्रों की भावनात्मक गहराई, सामाजिक संकेत और कथन के पीछे छिपी पीड़ा को स्पष्ट करना अत्यंत आवश्यक होता है।
Updated On: Jan 14, 2026
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Solution and Explanation

यह मार्मिक अंश प्रेमचंदीय यथार्थवाद की गहराई और सामाजिक संरचना के पतन का परिचायक है। इसमें एक बहू की संवेदनात्मक पीड़ा, अपमान, उपेक्षा और आत्मसम्मान की टूटन का अत्यंत भावनात्मक चित्रण है।
बड़ी बहुरिया, जो कभी हवेली की लक्ष्मी थी, आज अपने ही घर में पराई बन गई है। उसका अपने बेटे हरगोविन से संवाद उसकी असहनीय पीड़ा को उजागर करता है।
"हरगोविन भाई, तुमको एक संवाद ले जाना है" — यह वाक्य एक साधारण सूचना न होकर एक माँ के पास अपनी व्यथा भेजने का आख़िरी प्रयास है। वह ‘संवाद’ जो बहू अपने मायके नहीं, अपनी माँ के पास भेज रही है, उसमें उसके टूटते हुए आत्मबल और आत्मसम्मान की गुहार है।
जब वह कहती है — “बच्चों की जूठन खाकर एक कोने में पड़ी रहूँगी, लेकिन यहाँ अब नहीं...” — तो यह स्त्री की करुण गाथा बन जाती है। यह स्त्री-जीवन के उस पक्ष को उजागर करती है जहाँ घर-परिवार में सम्मान का स्थान नहीं बचता।
"किसी दिन पोखरे में डूब मरूँगी" — यह आत्महत्या की धमकी नहीं, बल्कि परिस्थितियों से उपजी गहन निराशा की अभिव्यक्ति है। इस संवाद से यह स्पष्ट होता है कि जब परिवार में अपने ही पराए हो जाएँ, तब जीवन भार बन जाता है।
हरगोविन का उसकी आँखों में देखना और कहना — "दिल को कड़ा कीजिए" — एक असहाय पुरुष की स्थिति को भी दर्शाता है, जो चाहकर भी कोई समाधान नहीं दे सकता।
यह संवाद केवल एक महिला की व्यथा नहीं है, बल्कि उस समाज का आइना है जहाँ बुजुर्गों का अपमान, महिलाओं की उपेक्षा और पारिवारिक विघटन आम हो चुका है।
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