Question:

‘जग-जीवन को भार’ की तरह लेकर फिरने वाला कवि उससे निरपेक्ष क्यों नहीं रह पाता? ‘आत्मपरिचय’ कविता के आधार पर स्पष्ट कीजिए। 
 

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कविता के भावों को यदि व्यक्ति के दृष्टिकोण और समाज की स्थिति से जोड़ सकें, तो उत्तर प्रभावशाली बनता है।
Updated On: Jan 14, 2026
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Solution and Explanation

‘आत्मपरिचय’ कविता में कवि स्वयं को एक ऐसा संवेदनशील व्यक्ति कहता है जो जीवन की पीड़ा, समाज के असंतुलन और मानवीय संघर्षों से आँख नहीं मोड़ सकता। वह कहता है कि वह “जग-जीवन का भार” अपने भीतर समेटे फिरता है।
इसका अर्थ है कि कवि संवेदना और सह-अस्तित्व का प्रतिनिधि है। वह अपने समय की पीड़ा, अन्याय और विषमता को देखकर उससे अलग नहीं रह सकता — वह अपने भीतर उसे अनुभव करता है और उसे काव्य के रूप में व्यक्त करता है।
कवि का यह जुड़ाव उसकी सामाजिक चेतना को दर्शाता है। उसके लिए काव्य केवल आत्मानुभूति नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद और दायित्व भी है।
इसलिए कवि निरपेक्ष नहीं रह सकता, क्योंकि उसकी रचना उसी “भार” से जन्म लेती है जिसे वह समाज से ग्रहण करता है।
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