निम्नलिखित गद्यांश पर आधारित पूछे गए प्रश्नों के सर्वाधिक उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प चुनकर लिखिए :
बाज़ार को सार्थकता भी वही मनुष्य देता है जो जानता है कि वह क्या चाहता है। और जो नहीं जानते कि वे क्या चाहते हैं, अपनी "परचेजिंग पावर" के गर्व में अपने पैसे से केवल एक विनाशक शक्ति – शीतलन शक्ति, व्यंजन की शक्ति ही बाजार को देते हैं। न तो वे बाजार से लाभ उठा सकते हैं, न उस बाजार को सच्चा लाभ दे सकते हैं। वे लोग बाजार का बाजारीकरण बढ़ाते हैं। जिसका मतलब है कि मूल्य बढ़ाना है। वस्तु की बढ़ती का अर्थ वस्तु में गुणों की घटती है। इस समष्टि में जब तक आदमी आपस में भाई-भाई और बहनें और पड़ोसी फिर से नहीं बन जाते हैं और आपस में खरीद और बेचने (क्रय-विक्रय) की तरह व्यवहार करते हैं। मानो दोनों एक-दूसरे को ठगने की घात में हों। एक की हानि में दूसरे को अपना लाभ दिखाई दे। और यह बाजार का, बल्कि इतिहास का, सत्य माना जाता है। ऐसे बाजार की बीच में लेकिन लोगों में आवश्यकताएँ तो असीमित नहीं होतीं; बल्कि शोषण होने लगता है। तब बाजार सशक्त होता है, विकृत विकराल होता है। ऐसे बाजार मानवता की निर्मिति विफल कर देंगे जो उचित बाजार का पोषण करता हो, जो सच्चा लाभ करता हुआ हो; वह शोषणरससिक्त और वह मायावी शास्त्र है, वह अर्थशास्त्र अनैतिक-शास्त्र है।
गद्यांश में प्रयुक्त ‘मायावी शास्त्र’ का अभिप्राय है :
‘मायावी शास्त्र’ शब्द का प्रयोग नकारात्मक संदर्भ में किया गया है।
यह किसी ऐसे शास्त्र की ओर संकेत करता है जो लोगों को भ्रमित करता है या छल-कपट के मार्ग को प्रशस्त करता है।
गद्यांश में यह दर्शाया गया है कि इस प्रकार के शास्त्र से नैतिक मूल्यों का ह्रास होता है और व्यक्ति वास्तविकता से भटक जाता है।
अतः ‘मायावी शास्त्र’ का अभिप्राय है – ऐसा शास्त्र जो छल-कपट को बढ़ावा देता हो।