Question:

निम्नलिखित गद्यांशों में से किसी एक गद्यांश की लगभग 100 शब्दों में सप्रसंग व्याख्या कीजिए: आप कह सकते हैं कि जन्मभर के साथी की चुनावट मट्टी के ढेलों पर छोड़ना कैसी बुद्धिमानी है ! अपनी आँखों से जगह देखकर, अपने हाथ से चुने हुए मट्टी के डगलों पर भरोसा करना क्यों बुरा है और लाखों-करोड़ों कोस दूर बैठे बड़े-बड़े मट्टी और आग के ढेलों - मंगल और शनैश्चर और बृहस्पति - की कल्पित चाल के कल्पित हिसाब का भरोसा करना क्यों अच्छा है, यह मैं क्या कह सकता हूँ ? बकौल वात्स्यायन के, आज का कबूतर अच्छा है कल के मोर से, आज का पैसा अच्छा है कल के मोहर से। आँखों देखा ढेला अच्छा ही होना चाहिए लाखों कोस की तेज पिण्ड से !

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प्रसंग में 'ढेले चुन लो' की वैदिक प्रथा बताइए, जिसमें कन्या ढेला उठाती थी, फिर ग्रहों की कल्पित गणना पर लेखक के व्यंग्य को समझाइए।
Updated On: Oct 21, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: सप्रसंग व्याख्या का ढाँचा:
गद्यांश की व्याख्या में पहले प्रसंग, फिर पंक्तियों की व्याख्या और अंत में विशेष लिखा जाता है। उत्तर लगभग 100 शब्दों में हो।

चरण 2: प्रसंग:
यह गद्यांश पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी की रचना 'सुमिरिनी के मनके' के तीसरे खंड 'ढेले चुन लो' से लिया गया है। लेखक बताता है कि वैदिक काल में स्नातक युवक कन्या के पिता के घर जाकर कन्या के सामने अलग-अलग स्थानों की मिट्टी के कुछ ढेले रख देता था, जैसे वेदि, गोशाला, खेत, चौराहे और मसान की मिट्टी। कन्या जो ढेला उठाती, उसी से उसके भविष्य का अनुमान लगाकर विवाह तय होता था।

चरण 3: व्याख्या:
लेखक कहता है कि आप कह सकते हैं कि जीवन भर के साथी का चुनाव मिट्टी के ढेलों पर छोड़ना कौन-सी समझदारी है। पर लेखक पलटकर पूछता है कि अपनी आँखों से जगह देखकर, अपने हाथ से चुने मिट्टी के ढेलों पर भरोसा करना बुरा क्यों है, जबकि लाखों-करोड़ों कोस दूर बैठे मंगल, शनि और बृहस्पति जैसे मिट्टी और आग के ढेलों की कल्पित चाल के कल्पित हिसाब पर भरोसा करना अच्छा माना जाता है। वात्स्यायन के कथन के अनुसार आज का कबूतर कल के मोर से और आज का पैसा कल की मोहर से अच्छा है। इसी तरह आँखों देखा ढेला लाखों कोस दूर के तेज पिंड से अच्छा ही होना चाहिए।

चरण 4: विशेष:
यह अंश ज्योतिष के आधार पर विवाह तय करने की प्रथा पर तीखा व्यंग्य है। 'मट्टी और आग के ढेले' कहकर ग्रहों का उपहास किया गया है। भाषा सरल, बोलचाल की है, जिसमें 'बकौल' जैसे उर्दू शब्द भी हैं। शैली तर्कपूर्ण और प्रश्नात्मक है।

अंतिम उत्तर:
गुलेरी जी कहते हैं कि अपनी आँखों से देखी हुई चीज़ पर भरोसा करना, दूर के ग्रहों की कल्पित गणना पर भरोसा करने से कहीं बेहतर है।
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