Question:

गद्यांश: यह प्रणाम-भाव ही भूमि और जन का दृढ़ बन्धन है। इसी दृढ़ भित्ति पर राष्ट्र का भवन तैयार किया जाता है। इसी दृढ़ चट्टान पर राष्ट्र का चिर जीवन आश्रित रहता है। इसी मर्यादा को मानकर राष्ट्र के प्रति मनुष्यों के कर्तव्य और अधिकारों का उदय होता है। जो जन पृथ्वी के साथ माता और पुत्र के संबंध को स्वीकार करता है, उसे पृथ्वी के वरदानों में भाग पाने का अधिकार है। माता के प्रति अनुराग और सेवाभाव पुत्र का स्वाभाविक कर्तव्य है। वह एक निष्कारण धर्म है। स्वार्थ के लिए पुत्र का माता के प्रति प्रेम, पुत्र के अधःपतन को सूचित करता है।
(v) प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से लेखक ने क्या संदेश दिया है?

Updated On: Sep 24, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: गद्यांश का केन्द्रीय भाव:
लेखक का कहना है कि भूमि और जन का सम्बन्ध माता और पुत्र का है। इस सम्बन्ध का आधार प्रणाम-भाव, अर्थात् भूमि के प्रति श्रद्धा और आदर है। राष्ट्र का पूरा भवन इसी दृढ़ नींव पर खड़ा होता है।

चरण 2: सन्देश:
हमें अपनी मातृभूमि को माता के समान पूजनीय मानना चाहिए। उससे प्रेम और उसकी सेवा हमारा स्वाभाविक कर्तव्य है। उसके वरदानों पर अधिकार तभी बनता है जब हम कर्तव्य निभाएँ। यह प्रेम निःस्वार्थ होना चाहिए, क्योंकि स्वार्थ के लिए किया गया प्रेम मनुष्य के पतन का कारण बनता है।

निष्कर्ष:
गद्यांश का सन्देश है कि निःस्वार्थ भाव से मातृभूमि की सेवा ही सच्चा राष्ट्र-धर्म है।
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