चरण 1: सन्दर्भ:
यह अंश वासुदेवशरण अग्रवाल के निबन्ध ‘राष्ट्र का स्वरूप’ से लिया गया है। इसमें लेखक ने भूमि और उसके निवासियों के सम्बन्ध को माता और पुत्र का सम्बन्ध बताया है।
चरण 2: शब्दार्थ:
वरदान: पृथ्वी से मिलने वाले अन्न, जल, रत्न आदि उपहार। अनुराग: गहरा प्रेम। निष्कारण धर्म: बिना किसी स्वार्थ के निभाया जाने वाला कर्तव्य।
चरण 3: व्याख्या:
लेखक कहते हैं कि जो मनुष्य पृथ्वी को अपनी माता और स्वयं को उसका पुत्र मानता है, वही उसकी सम्पदा का सच्चा अधिकारी है। जैसे माता पुत्र का पालन करती है, वैसे ही पृथ्वी अपने अन्न, जल, खनिज और रत्न देकर जन का पोषण करती है। बदले में पुत्र का कर्तव्य है कि वह माता से प्रेम करे और उसकी सेवा करे। यह प्रेम किसी लाभ की आशा से नहीं, स्वाभाविक भाव से होना चाहिए। इसलिए इसे निष्कारण धर्म कहा गया है।
चरण 4: विशेष:
भाषा तत्सम-प्रधान और गम्भीर है। शैली विचारात्मक है। ‘माता-पुत्र’ का रूपक इस सम्बन्ध को सरल बना देता है।