Question:

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः । ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ।।

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गीता के श्लोकों की व्याख्या करते समय, उसके आध्यात्मिक और दार्शनिक भाव को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण होता है। यहाँ 'ज्ञान' का अर्थ केवल सांसारिक ज्ञान नहीं, बल्कि आत्म-ज्ञान है और 'शांति' का अर्थ मोक्ष है।
Updated On: Nov 17, 2025
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Solution and Explanation

हिन्दी में व्याख्या:
प्रस्तुत श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता से लिया गया है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण ज्ञान-प्राप्ति के अधिकारी व्यक्ति के गुणों और ज्ञान के फल का वर्णन कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जो व्यक्ति श्रद्धावान् (जिसके मन में गुरु और शास्त्रों के प्रति श्रद्धा है), तत्परः (जो ज्ञान-प्राप्ति के लिए पूरी लगन से प्रयत्नशील है) और संयतेन्द्रियः (जिसने अपनी इन्द्रियों को वश में कर लिया है), वही ज्ञानं लभते (ज्ञान को प्राप्त करता है)। और इस प्रकार ज्ञानं लब्ध्वा (ज्ञान को प्राप्त करके) वह अचिरेण (शीघ्र ही) परां शान्तिम् (परम शान्ति अर्थात् मोक्ष को) अधिगच्छति (प्राप्त कर लेता है)। सच्चा ज्ञान व्यक्ति को सभी संशयों और दुःखों से मुक्त कर परम आनंद और शांति की अवस्था में पहुँचा देता है।
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