निम्नलिखित श्लोकों में से किसी एक श्लोक की हिन्दी में व्याख्या कीजिए:
(क) पश्याम्येकं भासमिति द्रोणं पार्थोऽभ्यभाषत ।
न तु वृक्षं भवन्तं वा पश्यामीति च भारत ।।
(ख) एकाकी चिन्तयेन्नित्यं, विविक्ते हितमात्मनः ।
एकाकी चिन्तयानो हि परं श्रेयोऽधिगच्छति ।।
व्याख्या प्रक्रिया:
श्लोक (क) की व्याख्या:
यह श्लोक महाभारत के भीष्म पर्व से है। इसमें अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से कहा कि उसने द्रोणाचार्य को देखा है, परन्तु वह वृक्षों और भवनों को नहीं देख पा रहा है। यहाँ अर्जुन की मानसिक स्थिति का उल्लेख है। वह युद्ध में भ्रमित और तनावग्रस्त है, और यही कारण है कि वह द्रोणाचार्य को पहचानने में असमर्थ है। यह श्लोक अर्जुन के मानसिक संघर्ष को दर्शाता है।
श्लोक (ख) की व्याख्या:
यह श्लोक योग और ध्यान के महत्व को बताता है। इसमें कहा गया है कि जो व्यक्ति अकेले में अपने आत्महित के बारे में निरंतर विचार करता है, वह जीवन में उच्चतम लाभ प्राप्त करता है। इसका अर्थ है कि अकेले में चिंतन करने से व्यक्ति को अपने आत्मज्ञान में वृद्धि होती है, और वह उच्चतम स्तर की शांति और आत्मसाक्षात्कार की ओर अग्रसर होता है।
उक्त गद्यांश का शीर्षक है :
शङ्करः कस्मिन् प्रदेशे जन्म लेभे ?
कालिदासस्य सर्वश्रेष्ठा नाट्यकृतिरस्ति :
'हिन्दुस्तान' पत्रस्य सम्पादकः कोऽस्ति आङ्गलशासने ?
धीमतां कालः कथं गच्छति ?
निम्नलिखित में से किसी एक श्लोक का संस्कृत में अर्थ लिखिए :
(क) अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः ।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुः विद्या यशो बलम् ।।
(ख) नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ।।
श्लोक की हिन्दी में व्याख्या कीजिए : अभिवादनशीलस्य, नित्यं वृद्धोपसेविनः । चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशोबलम् ।।
श्लोक का अर्थ संस्कृत में लिखिए : ब्राह्मे मुहूर्ते बुध्येत, धर्मार्थौ चानुचिन्तयेत् । कायक्लेशाँश्च तन्मूलान् वेदतत्वार्थमेव च ।।
श्लोक का अर्थ संस्कृत में लिखिए : पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम् । मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते ।।
निम्नलिखित में से किसी एक श्लोक का अर्थ संस्कृत में लिखिए :
(क) वाच्यं श्रद्धासमेतस्य पृच्छतश्च विशेषतः ।
प्रोक्तं श्रद्धाविहीनस्याप्यरण्यरुदितोपमम् ।।
(ख) न पाणिपादचपलो, न नेत्रच्चपलोऽनृजुः ।
न स्याद्वाक्वपलश्चैव, न परद्रोहकर्मधीः ।।