Question:

दिये गये संस्कृत पद्यांशों में से किसी एक का ससन्दर्भ हिन्दी में अनुवाद कीजिए:
अभूत् प्राची पिङ्गा रसपतिरिव प्राप्य कनकं
गतच्छायश्चन्द्रो बुधजन इव ग्राम्यसदसि ।
क्षणं क्षीणास्तारा नृपतय इवानुद्यमपराः
न दीपा राजन्ते द्रविणरहितानामिव गुणाः ॥

Updated On: Sep 24, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: सन्दर्भ:
यह श्लोक हमारी संस्कृत पाठ्य-पुस्तक के पाठ ‘भोजस्यौदार्यम्’ से लिया गया है। यह पाठ बल्लाल पण्डित रचित ‘भोजप्रबन्ध’ से संकलित है, जिसमें राजा भोज की उदारता और विद्वानों के आदर का वर्णन है। इसमें प्रातःकाल का सुन्दर चित्र खींचा गया है।

चरण 2: शब्दार्थ:
प्राची = पूर्व दिशा, पिङ्गा = पीली या सुनहरी, रसपतिः = पारा, कनकम् = सोना
गतच्छायः = कान्तिहीन, बुधजनः = विद्वान, ग्राम्यसदसि = गँवारों की सभा में
क्षीणाः = क्षीण या धुँधले हुए, अनुद्यमपराः = उद्योग न करने वाले
न राजन्ते = शोभा नहीं देते, द्रविणरहितानाम् = निर्धनों के

चरण 3: हिन्दी अनुवाद:
पूर्व दिशा पीली हो गई, जैसे सोने को पाकर पारा पीला हो जाता है। चन्द्रमा कान्तिहीन हो गया, जैसे गँवारों की सभा में पहुँचकर विद्वान् फीका पड़ जाता है। तारे क्षणभर में क्षीण हो गए, जैसे उद्यमहीन राजा शक्तिहीन हो जाते हैं। दीपक शोभा नहीं देते, जैसे निर्धन मनुष्यों के गुण नहीं चमकते।

चरण 4: भावार्थ:
प्रभात के समय पूर्व दिशा में पीली आभा फैली, चन्द्रमा और तारों की चमक घट गई और दीपकों का प्रकाश व्यर्थ हो गया। कवि ने प्रत्येक बात के लिए एक उचित उपमा दी है।

निष्कर्ष:
यह श्लोक उपमा अलंकार से भरा प्रभात-वर्णन है, जिसमें पहले पूर्व दिशा का, फिर चन्द्र, तारों और दीपों का बदलता रूप दिखाया गया है।
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