Question:

निम्नलिखित श्लोकों में से किसी एक श्लोक की हिन्दी में व्याख्या कीजिए : श्लोक की हिन्दी में व्याख्या कीजिए : श्लोक: भासं पश्यसि यद्येनं तथा ब्रूहि पुनर्वचः । शिरः पश्यामि भासस्य न गात्रमिति सोऽब्रवीत् ।।

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श्लेष अलंकार वाले श्लोकों की व्याख्या करते समय, शब्द के दोनों अर्थों को स्पष्ट रूप से समझाएँ और बताएँ कि कैसे कवि ने एक शब्द का प्रयोग करके दोहरे अर्थ की सुन्दर व्यंजना की है।
Updated On: Nov 17, 2025
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Solution and Explanation

व्याख्या:
प्रसंग: यह श्लोक महाकवि भास के विषय में एक प्रसिद्ध किंवदंती से संबंधित है। कहा जाता है कि जब एक समीक्षक ने भास के नाटकों की परीक्षा लेनी चाही, तो यह संवाद हुआ।
अर्थ: (परीक्षक ने कहा) "यदि तुम इस 'भास' को देखते हो, तो वैसा ही फिर से कहो।" उस (कवि) ने उत्तर दिया, "मैं 'भास' का सिर देखता हूँ, शरीर नहीं।"
विस्तृत व्याख्या: इस श्लोक में 'भास' शब्द पर श्लेष अलंकार का चमत्कार है। 'भास' शब्द के दो अर्थ हैं - एक, महाकवि 'भास' और दूसरा, 'भास' नामक एक शिकारी पक्षी।
जब परीक्षक पूछता है कि "तुम इस भास (कवि) को कैसा देखते हो?", तो कवि अपनी श्रेष्ठता को इंगित करते हुए उत्तर देता है कि "मैं भास (पक्षी) का केवल सिर देखता हूँ, उसका शरीर (गात्र) नहीं।"
इसका गूढ़ अर्थ यह है कि जिस प्रकार भास पक्षी आकाश में बहुत ऊँचाई पर उड़ता है और केवल उसका सिर ही दिखाई देता है, शरीर नहीं, उसी प्रकार काव्य जगत में कवि भास का स्थान इतना ऊँचा है कि अन्य कवि उनके सामने नगण्य हैं। एक अन्य व्याख्या यह भी है कि भास के नाटकों का केवल शीर्षक (सिर) ही मिल पाया है, पूरा शरीर (गात्र) नहीं, जो उनके कुछ नाटकों के खंडित रूप में मिलने की ओर संकेत करता है। यह श्लोक कवि भास की असाधारण प्रतिभा और उच्च काव्य-प्रतिष्ठा को व्यंजित करता है।
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