निम्नलिखित संस्कृत गद्यांश का संदर्भ सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए।
गद्यांश –
वाराणसी सुविख्याता प्राचीन नगरी। इयं विमलसलिलतरङ्गाया: गङ्गाया: कूले स्थिता। अस्या: घट्टटानां वलयाकृतिः पंक्तिः धवलायां चन्द्रकायां बहु राजते। अगणिता: पर्यटका: सुदूरेभ्यः देशेभ्यः नित्यं अत्र आगच्छन्ति, अस्या: घट्टटानां च शोभां विलोक्य इमां बहु प्रशंसन्ति।
संदर्भ:
यह गद्यांश वाराणसी नगरी के महत्व और उसकी प्राचीनता का वर्णन करता है। इसमें गंगा नदी के तट पर स्थित इस नगरी की अद्भुत शोभा, घाटों की विशेषता तथा देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के आकर्षण को प्रस्तुत किया गया है।
हिन्दी अनुवाद:
वाराणसी एक प्रसिद्ध प्राचीन नगरी है। यह पवित्र गंगा नदी के तट पर स्थित है। इसके घाटों की वलयाकार पंक्ति श्वेत चन्द्रमा की भाँति अत्यन्त सुन्दर प्रतीत होती है। अनेकों पर्यटक दूर-दूर के देशों से यहाँ प्रतिदिन आते हैं और इसके घाटों की शोभा देखकर इस नगरी की बहुत प्रशंसा करते हैं।
'रस मीमांसा' के लेखक हैं
'तितली' कृति की विधा है :
डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद लेखक हैं :
'साहित्य और कला' रचना है :
शुक्लोत्तर - युग के लेखक हैं :
दिए गए संस्कृत गद्यांश का संदर्भ सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए।
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निम्नलिखित संस्कृत गद्यावतरण का सन्दर्भ सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए :
गद्यांश :
तस्य तां वार्ता श्रुत्वा सः चतुरः ग्रामिणः अकथयत् – "भोः वयं अशिक्षिताः, भवान् च शिक्षितः; वयं अल्पज्ञाः, भवान् च बहुज्ञः। इत्थं विज्राय अस्माभिः समयः कर्त्तव्यः। वयं परस्परं प्रहेलिकाः प्रश्न्यामः। यदि भवान् उत्तरं दातुं समर्थः न भविष्यति तदा भवान् दशरूप्यकाणां दास्यति। यदि वयं उत्तरं दातुं समर्थाः न भविष्यामः तदा दशरूप्यकाणामर्धं पञ्चरूप्यकाणि दास्यामः।"
निम्नलिखित संस्कृत गद्यावतरणों में से किसी एक का सन्दर्भ सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए :
गद्यांश :
वाराणसी सुविख्याता प्राचीन नगरी। इयं विमलसलिलतरङ्गाया: गङ्गायाः कूले स्थितया। अस्या: घट्टतानां वलयाकृतिः पङ्क्तिः धवलाभ्यां चन्द्रिकाभ्यां बहु राजते। अगणिताः पर्यटकाः, सुतरेषु देशेषु च नित्यं अत्र आयान्ति। अस्या: घट्टतानां च शोभां विलोक्य इमां बहु प्रशंसन्ति।