निम्न गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
क्रोध का असर सबसे भयावह होता है। यह केवल नीति और सद्बुद्धि की बात नष्ट नहीं करता, बल्कि बुद्धि का भी नाश कर देता है। किसी युवा पुरुष की स्मृति यदि दूषित हो जाएगी, तो उसकी कोई भी योजना—जो वह पिछले वर्षों के अनुभव के आधार पर और जल्दी-जल्दी तैयार करे—उन दिनों असफल हो जाएगी। लोक-हित की ओर न जाकर, वह निजी प्रतिहिंसा/दुराग्रह में बदल जाएगी और यदि प्रतिहिंसा न भी हो तो वह सस्ते ढंग से हँसा देने वाली मूर्ख वायु के समान होगी, जो उसे निरंतर उन्नति के स्थान पर अवनति की ओर ढकेल देगी।
प्रश्न:
(i) उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए।
(ii) गद्यांश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) क्रोध का क्या प्रभाव होता है?
Step 1: प्रसंग (Context).
गद्यांश में लेखक यह सिद्ध करता है कि क्रोध मनुष्य की बौद्धिक-संरचना को सबसे अधिक क्षति पहुँचाता है; यह विषय आचरण-नीति/चरित्र-विकास के प्रसंग में उठाया गया है।
Step 2: रेखांकित अंश की व्याख्या.
(क) "बुद्धि का भी नाश कर देता है"—क्रोध क्षणिक आवेग में मन की विवेक-शक्ति छीन लेता है; परिणामस्वरूप सही-गलत का निर्णय भंग हो जाता है और निर्णय आवेग-प्रधान हो जाते हैं।
(ख) "सस्ते ढंग से हँसा देने वाली मूर्ख वायु"—क्रोध की दिशा लोक-हितकारी नहीं रहती; वह हल्के, अपरिपक्व, चंचल और दिखावटी व्यवहार में बदल जाती है, जो क्षणिक संतोष तो दे परन्तु दीर्घकालीन उन्नति में बाधक होती है।
Step 3: प्रभाव का निरूपण.
क्रोध: (i) नीति/सद्बुद्धि को निष्प्रभावी करता है, (ii) स्मृति और योजना-क्षमता को दूषित कर देता है, (iii) अनुभव-आधारित योजनाएँ भी असफल होने लगती हैं, (iv) व्यक्ति निजी प्रतिहिंसा/दुराग्रह में फँसकर अवनति की ओर लुढ़कता है।
'कंकाल' किस विधा की रचना है?
'वैशाली में वसन्त' किसका नाटक है?
जयशंकर प्रसाद किस युग के लेखक हैं?
ऐतिहासिक उपन्यासकार है—
शुक्लोत्तर-युग की समयावधि है—
निम्न वैकल्पिक गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
जहाँ-जहाँ हमारे नैतिक सिद्धान्तों का वर्णन आया है, अहिंसा को उनमें मुख्य स्थान दिया गया है। अहिंसा का दूसरा नाम 'क्षमा' भी माना गया है और क्षमा का दूसरा रूप त्याग या संयम के रूप में हमारे सामने आता है। यदि हमारी संस्कृति ने हमें अभिमान से ऊपर उठना और त्याग सीखाया है तो वह इसी नैतिक परंपरा के कारण है; अतः क्षमा-भाव को अपनाकर व्यक्ति के मन से क्रोध, द्वेष और प्रतिहिंसा हटती है, और जीवन-आचरण शुद्ध तथा आत्म-शासन से भर जाता है।
प्रश्न:
(i) उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) हमारे नैतिक सिद्धान्तों में किस चीज़ को प्रमुख स्थान दिया गया है? उसका दूसरा रूप क्या है?
दिए गए पद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
सुनि सुंदर बैनि मधुरास साने, सयानी हैं जानकी जानी भली।
तिरछे करि नैन दे सैंन तिन्हें, समझाइ करू मुसुकाइ चली॥
\(\underline{तुलसी तेहि औसर सोहें सबै, अवलोकति लोचन लालु अली।}\)
\(\underline{अनुराग-तड़ागा में मानु उठे, विगसि मनो मञ्जुल कंज कलि॥}\)
(i) उपर्युक्त पद्यांश का संदर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) उपयुक्त कविता में कौन-सा अलंकार एवं छन्द है?
दिए गए संस्कृत गद्यांशों में से किसी एक का सन्दर्भ सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए:
एषा नगरी भारतीय संस्कृते। संस्कृत भाषायाः केन्द्र–स्थानीम् अस्ति। इतः एव संस्कृत वाङ्मयस्य, संस्कृतेः आलोकः सर्वत्र प्रसृतः। मग़ध–गुजरातः, द्वार–शिखरः; अयं भारतीय–दर्शन–शास्त्राणां अध्यात्मस्य अङ्कुरः। सः तेजसा ज्ञानेन च प्रभातितः। अम्बरात्, यत्र तेः उपनिषद्–अनुवादः पारसी भाषायाम् अपि कृतः।
विश्वस्य स्रष्टा ईश्वरः। एक एव इति भारतीयः संस्कृतिः मन्यते। विभिन्न मतावलम्बिनां विधिः: नगानां; एकमेव एव ईश्वरं भजन्ति। अग्निः, इन्द्रः, कृष्णः, शिवः, रमाः, लक्ष्मीः, जगन्नाथः, शिवता–आदि:—इत्यान्ये\; नामानि एकस्य एव परमानन्दस्य: सकलं। तं एव ईश्वरम् जनाः: गुरुः इति मन्यन्ते। अतः सर्वेषां मतानां समभावः—समन्वयस्य उत्कृष्टं संस्कृतः संदेशः।