चरण 1: संदर्भ:
यह अंश एक हिन्दी गद्य-पाठ का है। इसमें लेखक वृद्ध स्त्रियों की प्रसन्नता के रहस्य को बताता है।
चरण 2: शब्दार्थ:
जोत = ज्योति, प्रकाश। जागरूक = सावधान, सचेत। लक्ष्यदर्शी = उद्देश्य को सामने रखने वाला। सेवा-निरत = सेवा में लगा हुआ। एकाग्र = एक ही ओर मन लगाने वाला।
चरण 3: व्याख्या:
लेखक प्रश्न करता है कि बुढ़ापे में भी चेहरों पर जो चमक और मुसकान है, वह किस दीपक का प्रकाश है। फिर वह स्वयं उत्तर देता है कि यह प्रकाश जागरूक जीवन का है, ऊँचे लक्ष्य पर दृष्टि रखने वाले जीवन का है, सेवा में लगे जीवन का है और अपने विश्वासों पर टिके जीवन का है। ऐसे लोगों को आयु का बोझ नहीं दबाता। उनके भीतर का उत्साह बना रहता है।
लेखक आगे कहता है कि भाषाओं के भेद पहले भी थे और आगे भी रहेंगे, पर यह जीवन-ज्योति सब भेदों से ऊपर है। यह पूरी दुनिया की सबसे श्रेष्ठ ज्योति है।
चरण 4: विशेष:
भाषा सरल और भावपूर्ण है। प्रश्नों और विस्मयादिबोधक वाक्यों से कथन प्रभावशाली बना है।
निष्कर्ष:
अर्थपूर्ण और सेवामय जीवन ही मनुष्य को बुढ़ापे में भी प्रसन्न रखता है।