Question:

अपठित गद्यांश: हमारी सांस्कृतिक अस्मिता का ह्रास तो हो ही रहा है, हम लक्ष्य भ्रम से भी पीड़ित हैं। विकास के विराट उद्देश्य से पीछे हट रहे हैं, हम झूठी तुष्टि के तात्कालिक लक्ष्यों का पीछा कर रहे हैं। मर्यादायें टूट रही हैं। नैतिक मानदण्ड ढीले पड़ रहे हैं। व्यक्ति केन्द्रिकता बढ़ रही है। स्वार्थ परमार्थ पर हावी हो रहा है। भोग की आकांक्षाएँ आसमान को छू रही हैं। उपभोक्ता संस्कृति हमारी सामाजिक नींव को हिला रही है।
(ii) उपभोक्ता संस्कृति का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

Updated On: Sep 24, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: शब्द का अर्थ:
उपभोक्ता संस्कृति उस जीवन-शैली को कहते हैं जिसमें अधिक से अधिक वस्तुओं को खरीदना, भोगना और जमा करना ही सुख और सफलता का पैमाना मान लिया जाता है।

चरण 2: गद्यांश के अनुसार स्पष्टीकरण:
इस संस्कृति में व्यक्ति अपने सुख को सबसे ऊपर रखता है। भोग की इच्छाएँ आसमान छूने लगती हैं और समाज तथा परमार्थ की चिंता पीछे छूट जाती है।

चरण 3: प्रभाव:
लेखक के अनुसार यह संस्कृति हमारी सामाजिक नींव को हिला रही है, क्योंकि इससे नैतिक मानदण्ड और मर्यादाएँ कमजोर पड़ रही हैं।

अंतिम उत्तर:
उपभोक्ता संस्कृति का अर्थ है वस्तुओं के भोग और उपयोग को ही जीवन का लक्ष्य मान लेने की प्रवृत्ति।
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