चरण 1: सन्दर्भ:
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के निबन्ध ‘राष्ट्र का स्वरूप’ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल हैं।
चरण 2: प्रसंग:
लेखक ने राष्ट्र के तीन अंग बताए हैं: भूमि, जन और संस्कृति। इन पंक्तियों में वे जन की संस्कृति को राष्ट्र का तीसरा और आवश्यक अंग सिद्ध करते हैं।
चरण 3: शब्दार्थ:
कबंध: सिर कटा हुआ धड़। अभ्युदय: उन्नति, उत्थान। वृद्धि: बढ़ना।
चरण 4: व्याख्या:
लेखक कहते हैं कि संस्कृति के बिना जन की कल्पना नहीं हो सकती। ऐसा जन सिर कटे धड़ के समान है, जिसमें जीवन तो दिखता है पर विचार और दिशा नहीं होती। जैसे मस्तिष्क शरीर को चलाता है, वैसे ही संस्कृति जन को सोच, आचरण और आदर्श देती है। इसीलिए संस्कृति को जन का मस्तिष्क कहा गया है। आगे लेखक बताते हैं कि जब संस्कृति का विकास और उन्नति होती है, तभी राष्ट्र आगे बढ़ता है। संस्कृति कमज़ोर हो तो राष्ट्र भी कमज़ोर होता है।
निष्कर्ष:
राष्ट्र की सच्ची उन्नति उसकी संस्कृति की उन्नति पर टिकी है।