Question:

गद्यांश: राष्ट्र का तीसरा अंग जन की संस्कृति है। मनुष्यों ने युग-युगों में जिस सभ्यता का निर्माण किया है, वही उसके जीवन की श्वास-प्रश्वास है। बिना संस्कृति के जन की कल्पना कबंधमात्र है, संस्कृति ही जन का मस्तिष्क है। संस्कृति के विकास और अभ्युदय के द्वारा ही राष्ट्र की वृद्धि सम्भव है। राष्ट्र के समग्र रूप में भूमि और जन के साथ-साथ जन की संस्कृति का महत्वपूर्ण स्थान है। यदि भूमि और जन अपनी संस्कृति से विरहित कर दिये जायँ तो राष्ट्र का लोप समझना चाहिए। जीवन के विटप का पुष्प संस्कृति है। संस्कृति के सौन्दर्य और सौरभ में ही राष्ट्रीय जन के जीवन का सौन्दर्य और यश अन्तर्निहित है।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

Updated On: Sep 24, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: सन्दर्भ:
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के निबन्ध ‘राष्ट्र का स्वरूप’ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल हैं।

चरण 2: प्रसंग:
लेखक ने राष्ट्र के तीन अंग बताए हैं: भूमि, जन और संस्कृति। इन पंक्तियों में वे जन की संस्कृति को राष्ट्र का तीसरा और आवश्यक अंग सिद्ध करते हैं।

चरण 3: शब्दार्थ:
कबंध: सिर कटा हुआ धड़। अभ्युदय: उन्नति, उत्थान। वृद्धि: बढ़ना।

चरण 4: व्याख्या:
लेखक कहते हैं कि संस्कृति के बिना जन की कल्पना नहीं हो सकती। ऐसा जन सिर कटे धड़ के समान है, जिसमें जीवन तो दिखता है पर विचार और दिशा नहीं होती। जैसे मस्तिष्क शरीर को चलाता है, वैसे ही संस्कृति जन को सोच, आचरण और आदर्श देती है। इसीलिए संस्कृति को जन का मस्तिष्क कहा गया है। आगे लेखक बताते हैं कि जब संस्कृति का विकास और उन्नति होती है, तभी राष्ट्र आगे बढ़ता है। संस्कृति कमज़ोर हो तो राष्ट्र भी कमज़ोर होता है।

निष्कर्ष:
राष्ट्र की सच्ची उन्नति उसकी संस्कृति की उन्नति पर टिकी है।
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