Question:

गद्यांश: पृथ्वी और आकाश के अंतराल में जो कुछ सामग्री भरी है, पृथ्वी के चारों ओर फैले हुए गंभीर सागर में जलचर एवं रत्नों की राशियाँ हैं, उन सबके प्रति चेतना और स्वागत के नये भाव राष्ट्र में फैलने चाहिए। राष्ट्र नवयुवकों के हृदय में उन सबके प्रति जिज्ञासा की नयी किरणें जब तक नहीं फूटतीं तब तक हम सोए हुए समान हैं। विज्ञान और उद्यम दोनों को मिलाकर राष्ट्र के भौतिक स्वरूप का एक नया ठाट खड़ा करना है।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

Updated On: Sep 24, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: सन्दर्भ:
यह अंश ‘राष्ट्र का स्वरूप’ पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल हैं।

चरण 2: प्रसंग:
लेखक राष्ट्र के भौतिक स्वरूप की चर्चा कर रहे हैं। वे कहते हैं कि पृथ्वी, आकाश और सागर की सम्पदा को जानने की भावना युवाओं में जागनी चाहिए।

चरण 3: शब्दार्थ:
जिज्ञासा = जानने की इच्छा। किरणें फूटना = नई चेतना का उदय होना। सोए हुए समान = निष्क्रिय, बेखबर।

चरण 4: व्याख्या:
लेखक का आशय है कि राष्ट्र के नवयुवकों के मन में जब तक प्रकृति की सम्पदा को जानने की नई इच्छा नहीं जागती, तब तक राष्ट्र जागृत नहीं माना जा सकता। धरती, आकाश और सागर में अपार भंडार भरे हैं। उन्हें जानने और काम में लाने की उत्सुकता ही राष्ट्र को आगे बढ़ाती है। जिज्ञासा के बिना राष्ट्र निष्क्रिय पड़ा रहता है।

निष्कर्ष:
युवाओं में ज्ञान-विज्ञान की जिज्ञासा जगाना राष्ट्र की उन्नति के लिए आवश्यक है। इस अंश की भाषा शुद्ध, सरल और भावपूर्ण है, शैली विचारात्मक है।
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