Question:

गद्यांश: पृथ्वी और आकाश के अन्तराल में जो कुछ सामग्री भरी है, पृथ्वी के चारों ओर फैले हुए गम्भीर सागर में जो जलचर एवं रत्नों की राशियाँ हैं, उन सबके प्रति चेतना और स्वागत के नये भाव राष्ट्र में फैलने चाहिए। राष्ट्र के नवयुवकों के हृदय में उन सबके प्रति जिज्ञासा की नयी किरणें जब तक नहीं फूटतीं तब तक हम सोए हुए के समान हैं।
विज्ञान और उद्यम दोनों को मिलाकर राष्ट्र के भौतिक स्वरूप का एक नया ठाट खड़ा करना है। यह कार्य प्रसन्नता, उत्साह और अधक परिश्रम द्वारा नित्य आगे बढ़ाना चाहिए। हमारा यह ध्येय हो कि राष्ट्र में जितने हाथ है, उनमें से कोई भी इस कार्य में भाग लिये बिना रीता न रहे।
(i) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

Updated On: Sep 24, 2026
Show Solution
collegedunia
Verified By Collegedunia

Solution and Explanation

चरण 1: सन्दर्भ:
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘सामान्य हिन्दी’ के गद्य खण्ड में संकलित निबन्ध ‘राष्ट्र का स्वरूप’ से लिया गया है। इसके लेखक प्रसिद्ध विद्वान् डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल हैं।

चरण 2: अंश का परिचय:
इस अंश में लेखक ने राष्ट्र के भौतिक स्वरूप को निखारने की बात कही है। वे चाहते हैं कि धरती, आकाश और सागर की सम्पदा के प्रति नयी चेतना जागे।
विज्ञान और परिश्रम के मेल से राष्ट्र को आगे बढ़ाने का सन्देश भी इसी अंश में दिया गया है।

निष्कर्ष:
पाठ: राष्ट्र का स्वरूप, लेखक: वासुदेवशरण अग्रवाल।
Was this answer helpful?
0
0

Top UP Board XII गद्य खंड Questions

View More Questions