Question:

अपठित गद्यांश: इच्छाएं नाना हैं और नाना विधि हैं और वे उसे प्रवृत्त रखती हैं। उस प्रवृत्ति से वह रह-रहकर थक जाता है और निवृत्ति चाहता है। यह प्रवृत्ति और निवृत्ति का चक्र उसको द्वन्द्व से थका मारता है। इस संसार को वह अभी राग-भाव से चाहता है कि अगले क्षण उतने ही भाव-विराग से वह उसका विनाश चाहता है। पर राग-द्वेष की वासनाओं से अंत में झुंझलाइट ही उसे हाथ आती है।
(i) प्रवृत्ति और निवृत्ति के चक्र में फँसा मनुष्य क्यों रुक जाता है?

Updated On: Sep 24, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: प्रश्न को समझें:
प्रश्न पूछता है कि प्रवृत्ति और निवृत्ति के चक्र में फँसा मनुष्य क्यों रुक जाता है। गद्यांश में इसका कारण दिया है।

चरण 2: गद्यांश से कारण:
गद्यांश के अनुसार मनुष्य की इच्छाएँ अनेक हैं और उनके रूप भी अनेक हैं। ये इच्छाएँ उसे हर समय किसी न किसी काम में लगाए रखती हैं।
इस लगातार दौड़-धूप से वह बार-बार थक जाता है। थकान के कारण वह काम से छुटकारा यानी निवृत्ति चाहने लगता है। इसी कारण वह रुक जाता है।

अंतिम उत्तर:
अनेक प्रकार की इच्छाएँ मनुष्य को निरंतर काम में लगाए रखती हैं, जिससे वह थककर रुक जाता है और निवृत्ति चाहता है।
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