'प्रेम-माधुरी' हिंदी साहित्य के रीतिकाल की एक प्रसिद्ध रचना है। रीतिकाल को 'श्रृंगार काल' या 'काव्यशास्त्रीय काल' भी कहा जाता है, क्योंकि इस काल में कवियों ने नायिका-भेद, श्रृंगार रस, अलंकार, नीति और प्रेम के विविध रूपों का अत्यंत सुंदर चित्रण किया।
रीतिकाल में कवियों का उद्देश्य भावनात्मक और कलात्मक सौंदर्य का प्रदर्शन करना था। इस काल में कवियों ने राजदरबारों में रहकर काव्य की रचना की, जिसमें भाषा, अलंकार और नायिका-चित्रण को विशेष महत्व दिया गया।
'प्रेम-माधुरी' ऐसी ही कृति है जिसमें श्रृंगार रस की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति मिलती है। इस रचना में प्रेम को केवल लौकिक नहीं, बल्कि आत्मिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से भी प्रस्तुत किया गया है। इसका भाषा-शिल्प, छंद-विन्यास और भाव-सौंदर्य रीतिकाल की विशिष्टताओं को पूर्ण रूप से प्रकट करता है।
अतः यह स्पष्ट है कि 'प्रेम-माधुरी' रीतिकाल की एक प्रमुख रचना है, जो उस युग की भावनात्मक और कलात्मक प्रवृत्तियों का सशक्त उदाहरण है।