Question:

दिए गए संस्कृत गद्यांश का ससन्दर्भ हिन्दी में अनुवाद कीजिए:
यथैवोपकरणवतां जीवनं तथैव ते जीवनं स्यात् । अमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेन इति । सा मैत्रेयी उवाच-येनाहं नामृता स्याम् किमहं तेन कुर्याम् । यदेव भगवान् केवलममृतत्वसाधनं जानाति, तदेव मे ब्रूहि । याज्ञवल्क्य उवाच - प्रिया नः सती त्वं प्रियं भाषसे ।

Updated On: Sep 24, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: सन्दर्भ:
प्रस्तुत गद्यांश हमारी संस्कृत-पाठ्यपुस्तक में संकलित याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी के संवाद से लिया गया है। इसका मूल स्रोत बृहदारण्यक उपनिषद् है। इसमें महर्षि याज्ञवल्क्य और उनकी पत्नी मैत्रेयी की बातचीत है।

चरण 2: शब्दार्थ:
उपकरणवताम् = साधन-सम्पन्न लोगों का
जीवनम् = जीवन
अमृतत्वस्य = अमरता (मोक्ष) की
नाशा = न + आशा, अर्थात् आशा नहीं
वित्तेन = धन से
ब्रूहि = कहिए
भाषसे = बोलती हो

चरण 3: हिन्दी अनुवाद:
याज्ञवल्क्य ने कहा: जैसा साधन-सम्पन्न लोगों का जीवन होता है, वैसा ही तुम्हारा जीवन भी होगा। परन्तु धन से अमरता प्राप्त होने की कोई आशा नहीं है।
उस मैत्रेयी ने कहा: जिस धन से मैं अमर न हो सकूँ, उसे लेकर मैं क्या करूँगी? भगवन्! आप अमरता का जो एकमात्र साधन जानते हैं, वही मुझे बताइए।
याज्ञवल्क्य बोले: तुम हमें प्रिय हो और प्रिय बात ही कह रही हो।

चरण 4: सार:
धन से सुख-सुविधा मिल सकती है, अमरता या मोक्ष नहीं। मैत्रेयी को भौतिक सम्पत्ति से अधिक ज्ञान प्यारा था।

निष्कर्ष:
इस अंश का सन्दर्भ सहित हिन्दी अनुवाद ऊपर दिया गया है।
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