संदर्भ: यह श्लोक श्रेष्ठ पुरुषों के गुणों की परस्पर श्रृंखला-बद्धता को दर्शाता है। हिन्दी अनुवाद: ज्ञान होने पर भी मौन (विनम्रता) रखना, शक्ति (सामर्थ्य) होने पर भी क्षमा करना, और त्याग करने पर भी प्रशंसा की इच्छा न रखना — ये सभी गुण एक-दूसरे से जुड़े हुए होते हैं, मानो एक ही सद्गुण-रूपी वृक्ष की उत्तम सन्ततियाँ हों।