Question:

दिये गये संस्कृत गद्यांशों में से किसी एक का ससन्दर्भ हिन्दी में अनुवाद कीजिये:
अथैकः शकुनिः सर्वेषां मध्यादाशयग्रहणार्थं त्रिकृत्वः अश्रावयत् । ततः एकः काकः उत्थाय तिष्ठ तावत्, अस्य एतस्मिन् राज्याभिषेक काले एवं रूपं मुखम् क्रुद्धस्य च कीदृशं भविष्यति ? अनेन हि क्रुद्धेन अवलोकिताः वयं तप्तकटाहे प्रक्षिप्ततिलाः इव तत्र तत्रैव धक्ष्यामः । ईदृशो राजा मह्यं न रोचते इत्याह - न मे रोचते भद्रं व उलूकस्याभिषेचनम् । अक्रुद्धस्य मुखं पश्य कथं क्रुद्धो भविष्यति ॥

Updated On: Sep 24, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: सन्दर्भ:
यह गद्यांश ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के पाठ ‘जातक-कथा’ से लिया गया है। यह कथा पक्षियों द्वारा उल्लू को राजा बनाने के प्रसंग की है, जिसमें कौआ इसका विरोध करता है।

चरण 2: शब्दार्थ:
शकुनिः = पक्षी। आशयग्रहणार्थम् = मन की बात या मत जानने के लिए। त्रिकृत्वः = तीन बार। अश्रावयत् = सुनाया, घोषणा की। काकः = कौआ। क्रुद्धः = क्रोध में आया हुआ। तप्तकटाहे = गरम कड़ाही में। धक्ष्यामः = जल जाएँगे। रोचते = अच्छा लगता है।

चरण 3: हिन्दी अनुवाद:
तब एक पक्षी ने सबके बीच सबका मत जानने के लिए तीन बार घोषणा की। इसके बाद एक कौआ उठकर बोला: ठहरो, अभी इसके राज्याभिषेक के समय ही इसका मुख ऐसा है, तो क्रोध आने पर कैसा होगा? इसके क्रोध से देखे गए हम गरम कड़ाही में डाले गए तिलों की तरह वहीं-के-वहीं जल जाएँगे। ऐसा राजा मुझे पसन्द नहीं है। यह कहकर उसने श्लोक कहा: तुम सबका कल्याण हो, पर उल्लू को राजा बनाना मुझे अच्छा नहीं लगता। जो क्रोध में नहीं है, उसका मुख देखो। क्रोध में आने पर वह कैसा हो जाएगा?

निष्कर्ष:
कौए का कहना है कि जो शान्त अवस्था में भी भयानक लगता है, वह क्रोधी होकर और भी कष्ट देगा। इसलिए वह राजा के योग्य नहीं है।
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