Question:

दिये गये संस्कृत गद्यांशों में से किसी एक का ससन्दर्भ हिन्दी में अनुवाद कीजिये:
अतीते प्रथमकल्पे जनाः एकमभिरूपं सौभाग्यप्राप्तं सर्वाकारपरिपूर्णं पुरुषं राजानमकुर्वन् । चतुष्पदा अपि सन्निपत्य एकं सिंहं राजानमकुर्वन् । ततः शकुनिगणाः हिमवत्प्रदेशे एकस्मिन् पाषाणे सन्निपत्य मनुष्येषु राजा प्रज्ञायते तथा चतुष्पदेषु च । अस्माकं पुनरन्तरे राजा नास्ति । अराजको वासो नाम न वर्तते । एको राजस्थाने स्थापयितव्यः इति उक्तवन्तः । अथ ते परस्परमवलोकयन्तः एकमुलूकं दृष्ट्वा 'अयं नो रोचते' इत्यवोचन् ।

Updated On: Sep 24, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: सन्दर्भ:
यह गद्यांश ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के पाठ ‘जातक-कथा’ से लिया गया है। इसका सम्बन्ध उलूक-जातक की कथा से है, जिसमें पक्षियों द्वारा राजा चुनने का वर्णन है।

चरण 2: शब्दार्थ:
अतीते प्रथमकल्पे = बहुत प्राचीन पहले कल्प में। अभिरूपम् = सुन्दर। सौभाग्यप्राप्तम् = भाग्यशाली। चतुष्पदाः = चौपाए पशु। शकुनिगणाः = पक्षियों के समूह। सन्निपत्य = एकत्र होकर। अराजकः = राजा से रहित। उलूकम् = उल्लू।

चरण 3: हिन्दी अनुवाद:
बहुत पहले, प्रथम कल्प में लोगों ने एक सुन्दर, भाग्यशाली और सब प्रकार से पूर्ण पुरुष को राजा बनाया। चौपाए पशुओं ने भी इकट्ठे होकर एक सिंह को राजा बनाया। तब पक्षियों के झुण्ड हिमालय प्रदेश में एक चट्टान पर एकत्र हुए और बोले: मनुष्यों में राजा जाना जाता है और चौपायों में भी, पर हमारे बीच कोई राजा नहीं है। बिना राजा के रहना ठीक नहीं है। किसी एक को राजा के स्थान पर बैठाना चाहिए। फिर उन्होंने एक-दूसरे की ओर देखते हुए एक उल्लू को देखा और कहा: यह हमें पसन्द है।

चरण 4: सार:
मनुष्यों और पशुओं की तरह पक्षियों ने भी अपना राजा चुनना चाहा और उनकी दृष्टि उल्लू पर टिकी।
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