Question:

दिये गये संस्कृत गद्यांशों में से किसी एक का ससन्दर्भ हिन्दी में अनुवाद कीजिये:
महामना विद्वान् वक्ता, धार्मिको नेता पटुः पत्रकारश्चासीत् । परमस्य सर्वोच्चं गुणः, जनसेवैव आसीत् । यत्र कुत्रापि अयं जनान् दुःखितान् पीड्यमानांश्चापश्यत् तत्रैव सः शीघ्रमेव उपस्थितः सर्वविधं साहाय्यञ्च अकरोत् । प्राणिसेवा अस्य स्वभाव एवासीत् । अद्यास्माकं जनान् सन्मार्गं दर्शयन् स्थाने-स्थाने, जने-जने उपस्थित एव ।
जयन्ति ते महाभागा जनसेवा परायणाः ।
जरामृत्युभयं नास्ति येषां कीर्तितनोः क्वचित् ॥

Updated On: Sep 24, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: सन्दर्भ:
यह गद्यांश संस्कृत दिग्दर्शिका के पाठ ‘महामना मालवीयः’ से लिया गया है। इसमें काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक पं. मदनमोहन मालवीय जी के गुणों का वर्णन है।

चरण 2: शब्दार्थ:
महामनाः = महान् हृदय वाले। पटुः = कुशल। जनसेवा = लोगों की सेवा। पीड्यमानान् = पीड़ित होते हुओं को। साहाय्यम् = सहायता। सन्मार्गम् = अच्छा मार्ग। जरामृत्युभयम् = बुढ़ापे और मृत्यु का डर। कीर्तितनुः = यशरूपी शरीर।

चरण 3: हिन्दी अनुवाद:
महामना मालवीय जी विद्वान्, वक्ता, धार्मिक नेता और कुशल पत्रकार थे। उनका सबसे ऊँचा गुण जनसेवा ही था। जहाँ कहीं वे लोगों को दुखी और पीड़ित देखते थे, वहीं शीघ्र पहुँच जाते थे और हर प्रकार की सहायता करते थे। प्राणियों की सेवा उनका स्वभाव ही था। आज भी हमारे लोगों को अच्छा मार्ग दिखाते हुए वे स्थान-स्थान पर और जन-जन के बीच उपस्थित ही हैं।
श्लोक का अनुवाद: वे महान भाग्यशाली जनसेवा में लगे लोग विजयी होते हैं, जिनके यशरूपी शरीर को कहीं भी बुढ़ापे और मृत्यु का भय नहीं होता।

निष्कर्ष:
जनसेवा करने वाले महापुरुष अपने यश के रूप में सदा जीवित रहते हैं।
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