(क) विभक्ति पहचानने की प्रक्रिया:
पद (i) "नेत्राभ्यां" का विभक्ति:
"नेत्राभ्यां" शब्द में सप्तमी विभक्ति का प्रयोग हुआ है, क्योंकि यह "नेत्र" के साथ क्रिया का संबंध स्थान या उपकरण के रूप में होता है।
पद (ii) "कदलीफलानि" का विभक्ति:
"कदलीफलानि" में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है, क्योंकि यह "कदलीफल" शब्द का कर्म के रूप में प्रयोग हो रहा है, जिसमें क्रिया का उद्देश्य और क्रियावाचक शब्द है।
पद (iii) "वनात्" का विभक्ति:
"वनात्" में सप्तमी विभक्ति का प्रयोग हुआ है, क्योंकि यह एक स्थान या स्रोत के रूप में प्रकट हो रहा है।
(ख) प्रत्यय पहचानने की प्रक्रिया:
पद (i) "पीत्वा" में प्रत्यय:
"पीत्वा" में क्रिया प्रत्यय है, जो "पी" (पीने) क्रिया से बना है। यह "तृतीय विभक्ति" के आधार पर क्रियापद के रूप में आता है।
पद (ii) "पठितुम्" में प्रत्यय:
"पठितुम्" में क्रिया प्रत्यय है, जो "पठ" (पढ़ना) क्रिया से उत्पन्न हुआ है। यह "उद्देश्य" या "इच्छा" को दर्शाता है।
पद (iii) "चलनीयः" में प्रत्यय:
"चलनीयः" में विशेषण प्रत्यय है, जो "चल" (चलना) क्रिया से उत्पन्न हुआ है, और यह किसी विशेषण के रूप में कार्य करता है।