Question:

‘जब मन दुःखी होता है तो सुंदरता भी हमें अपनी ओर आकृष्ट नहीं कर पाती।’ विद्यापति रचित ‘पद’ के आधार पर सिद्ध कीजिए।

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कविता का विश्लेषण करते समय केवल शाब्दिक अर्थ नहीं, गहरे भावार्थ पर ध्यान दें, विशेषतः मनोवैज्ञानिक संदर्भों में।
Updated On: Jan 14, 2026
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Solution and Explanation

विद्यापति के ‘पद’ में विरहिणी नायिका की मनःस्थिति को बड़ी मार्मिकता से प्रस्तुत किया गया है। कविता यह संदेश देती है कि जब हृदय पीड़ा और वियोग से भर जाता है, तब बाह्य सुंदरता, ऋतुओं की शोभा, प्राकृतिक सौंदर्य — सब व्यर्थ प्रतीत होता है।
नायिका के मन में इतना दुःख है कि उसे वसंत ऋतु की मधुरता, फूलों की रंगत, या कोयल की कूक भी आनंद नहीं देती।
यह मनोविज्ञान का भी एक सत्य है — दुःख की स्थिति में मनुष्य की अनुभूति सीमित हो जाती है, और वह किसी भी सौंदर्य को स्वीकार नहीं कर पाता।
इसलिए यह पंक्ति जीवन की उस अनुभूति को उजागर करती है जहाँ मानसिक पीड़ा, बाहरी सुंदरता पर हावी हो जाती है।
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