Question:

निम्नलिखित पद्यांश पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए : "सामने टिकते नहीं वनराज, पर्वत डोलते हैं, काँपता है कुंडली मारे समय का व्याल, मेरी बाँह में मारुत, गरण, गजराज का बल है। मर्त्य मानव की विजय का तूर्य हूँ मैं, उर्वशी! अपने समय का सूर्य हूँ मैं। अंध तम के भाल पर पावक जलाता हूँ, बादलों के सीस पर स्यन्दन चलाता हूँ।" (i) उपर्युक्त पद्यांश के पाठ और कवि का नाम लिखिए। (ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए। (iii) राजा पुरुरवा अपने मन की स्थिति का वर्णन किससे कर रहे हैं? (iv) 'व्याल' और 'स्यन्दन' शब्द का अर्थ लिखिए। (v) 'मारुत' और 'पावक' किसके पर्यायवाची शब्द हैं?

Updated On: Sep 23, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1 (पाठ व कवि):
यह पद्यांश दिनकरकृत खण्डकाव्य 'उर्वशी' का अंश है, जिसमें राजा पुरुरवा उर्वशी के समक्ष अपने आत्मविश्वास और पौरुष-बल का उद्घोष कर रहे हैं।

चरण 2 (व्याख्या):
राजा पुरुरवा कहते हैं कि उनके सामने न वन के राजा सिंह टिक पाते हैं, न पर्वत उनके तेज से काँपने लगते हैं, और काल-सर्प (समय का व्याल) भी उनकी शक्ति से थर्रा उठता है — अर्थात् वे अपने भुजबल की तुलना वायु, हाथी और सिंह के संयुक्त बल से करते हुए स्वयं को मानव-विजय का शंखनाद तथा अपने युग का सूर्य घोषित करते हैं, जो अन्धकार में प्रकाश (पावक) जलाकर बादलों तक अपने रथ (स्यन्दन) की गति पहुँचाने में समर्थ है।

चरण 3 (किससे वर्णन):
राजा पुरुरवा अपने मन की स्थिति का वर्णन उर्वशी के समक्ष कर रहे हैं।

चरण 4 (शब्दार्थ):
'व्याल' का अर्थ है सर्प और 'स्यन्दन' का अर्थ है रथ।

चरण 5 (पर्यायवाची):
'मारुत' वायु का पर्यायवाची है और 'पावक' अग्नि का पर्यायवाची है।
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