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संस्कृत गद्यांश:
मैत्रेयी उवाच-यदहं सर्व पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्याम, तत्किं नेनामृता स्यामिति।याज्ञवल्क्य उवाच-नेति। यथैवोपकरणवतां जीवनं तथैव ते जीवनं स्यात्। अनुपलब्ध्वा तु नाशासि वितेनैति। मा मैत्रेयी क्वथा नः।सति तं प्रियं भवेत्।
‘आचारण की सभ्यता’ निबंध के लेखक हैं:
‘हिन्दी नयी चाल में ढली’ यह कथन किस लेखक का है?
‘उसने कहा था’ कहानी के लेखक हैं:
‘पिंजरे की मैना’ निबंध संग्रह के लेखक हैं:
‘कलम का सिपाही’ के रचनाकार हैं:
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संस्कृत गद्यांश:
संस्कृत साहित्यस्य आदिकवि: वाल्मीकि:, महाकवय: कालिदास:।काव्यकुलगुरु: कालिदास:। अन्ये च भार-भारती भाषायामपि महाकवय: वर्तन्ते। यथैव अत्रापि पाठकानां हृदि विस्तारिते। इयं भाषा अमृतम:।मातृभूमि समानमपि वन्दनीयं च, यतो भारतस्य: स्वातंत्र्यं, गौरवम्, अज्ञातजयं सांस्कृतिकधरोकम सत्यव्रतेन सुरक्षितं संरक्षितम्।
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संस्कृत गद्यांश:
ध्याय धारयेद् धर्मं मध्यमं जाति: परमं गर्वितोऽस्मि।
धन्यान् ज्ञायाः। धृतव्रतिनां ज्ञानं द्रविणं च ऋषयः।
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संस्कृत गद्यांश:
कर्मणि मे धाराभाषा मन-मेघ-वायवा:।
ज्ञानप्रभायाः नाशिनं देयं कीर्तिमतो: जीवितम्।