'ध्रुवस्वामिनी' हिंदी साहित्य का एक अत्यंत प्रसिद्ध और विचारोत्तेजक नाटक है, जिसके रचनाकार जयशंकर प्रसाद हैं। यह नाटक छायावादी युग की नाट्य परंपरा का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, जिसमें नारी की स्वतंत्रता, आत्मसम्मान और जीवन-मूल्यों की गहरी अभिव्यक्ति मिलती है।
जयशंकर प्रसाद ने इस नाटक के माध्यम से भारतीय समाज में स्त्री की स्थिति, उसकी अस्मिता, तथा उसके अधिकारों से जुड़ी समस्याओं को बड़ी संवेदनशीलता से प्रस्तुत किया है। 'ध्रुवस्वामिनी' का केन्द्रीय पात्र 'ध्रुवा' एक ऐसी नारी है जो अपने स्वाभिमान और आत्मनिर्णय की भावना से समाज की परंपराओं को चुनौती देती है।
इस रचना में प्रसाद ने यह दिखाया है कि नारी केवल सहनशीलता का प्रतीक नहीं है, बल्कि उसमें आत्मसम्मान, विवेक और निर्णय की क्षमता भी निहित है। नाटक का सामाजिक संदेश यह है कि समाज तभी सशक्त बन सकता है जब उसमें स्त्री और पुरुष दोनों को समान सम्मान मिले।
अतः स्पष्ट है कि 'ध्रुवस्वामिनी' के रचनाकार जयशंकर प्रसाद हैं, जिन्होंने इसे भारतीय नारी की गरिमा और स्वाधीनता का प्रतीक बनाया।