चरण 1: सर्ग का परिचय:
‘रश्मिरथी’ रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का खण्डकाव्य है। इसके पंचम सर्ग का नाम ‘माता की विनती’ है। इसमें कुन्ती और कर्ण का मार्मिक संवाद है।
चरण 2: कथावस्तु:
महाभारत का युद्ध निश्चित हो जाने पर कुन्ती चिन्तित है कि रणभूमि में उसके ही दो पुत्र, कर्ण और अर्जुन, आमने-सामने होंगे।
इसी चिन्ता में वह कर्ण के पास जाती है और उसे उसके जन्म का रहस्य बताती है। वह स्वीकार करती है कि लोक-लज्जा के कारण उसने कर्ण को जल में बहा दिया था।
कुन्ती कर्ण से दुर्योधन का साथ छोड़कर पाण्डवों के पक्ष में आने की प्रार्थना करती है।
कर्ण माँ की बात सुनकर दुखी होता है, पर अपने मित्र दुर्योधन के उपकार को नहीं भूलता। वह कहता है कि संकट के समय साथ छोड़ना विश्वासघात होगा।
अन्त में कर्ण वचन देता है कि वह अर्जुन को छोड़कर किसी और पाण्डव को नहीं मारेगा। इस प्रकार युद्ध के बाद भी कुन्ती के पाँच पुत्र जीवित रहेंगे।
कुन्ती निराश होकर लौट जाती है।
निष्कर्ष:
पंचम सर्ग में कर्ण की मित्र-निष्ठा, दानशीलता और त्याग उभरकर सामने आते हैं। यही इस सर्ग की मुख्य कथा है।
चरण 3: अतिरिक्त बिन्दु (शब्द-सीमा से बाहर):
कर्ण माँ को ‘पाँच पुत्रों की माता’ बने रहने का आशीर्वाद-सा आश्वासन देता है।
इस सर्ग से कर्ण का ‘दानवीर’ और ‘मित्र-धर्म निभाने वाला’ रूप स्पष्ट होता है।