Question:

'त्यागपथी' खण्डकाव्य के चतुर्थ सर्ग का कथानक लिखिए। (अधिकतम शब्द सीमा 80 शब्द)

Updated On: Sep 24, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: सर्ग का परिचय:
‘त्यागपथी’ रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ का पाँच सर्गों का ऐतिहासिक खण्डकाव्य है। चतुर्थ सर्ग में कथा का केन्द्र राज्यश्री का संन्यास-विचार और हर्ष का समझाना है।

चरण 2: कथानक:
तृतीय सर्ग के बाद हर्ष की राजसत्ता दृढ़ हो चुकी है। तब राज्यश्री राज्य और महलों का सुख छोड़कर गेरुए वस्त्र पहन संन्यास लेना चाहती है।
हर्ष उसे प्रेम से समझाते हैं कि वह मन से पहले ही संन्यासिनी है। उसका जीवन त्याग से भरा है।
आचार्य दिवाकर मित्र भी दोनों को उपदेश देते हैं कि केवल वन में जाकर तप करना ही संन्यास नहीं है। दुखी प्रजा और देश की सेवा उससे भी बड़ा धर्म है।
यह सुनकर राज्यश्री संन्यास का विचार छोड़ देती है। हर्ष और राज्यश्री दोनों देश-सेवा को ही अपना व्रत बना लेते हैं।

निष्कर्ष:
इस सर्ग का सन्देश है कि सच्चा त्याग कर्तव्य और लोक-कल्याण में है। इसी से अगले सर्ग की उदारता और दान की भूमिका बनती है।
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