चरण 1: काव्य का परिचय:
‘रश्मिरथी’ रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का सात सर्गों वाला खण्डकाव्य है (1952)। इसका नायक महाभारत का पात्र कर्ण है। ‘रश्मिरथी’ का अर्थ है सूर्य-किरणों के रथ का सवार।
चरण 2: कथावस्तु (सर्ग-क्रम से):
1. प्रथम सर्ग: रंगभूमि में कर्ण अपनी धनुर्विद्या से सबको चकित करता है। अर्जुन से टक्कर माँगने पर उसे सूतपुत्र कहकर अपमानित किया जाता है। दुर्योधन उसे अंगदेश का राजा बनाकर मित्र बना लेता है।
2. द्वितीय सर्ग: कर्ण परशुराम के आश्रम में ब्राह्मण बनकर शिक्षा पाता है। जंघा पर कीड़े के काटने पर भी वह गुरु की नींद नहीं तोड़ता। सच जानकर परशुराम उसे शाप देते हैं कि निर्णायक समय पर वह अस्त्र-विद्या भूल जाएगा।
3. तृतीय सर्ग: श्रीकृष्ण पाण्डवों के लिए पाँच गाँव माँगने जाते हैं। दुर्योधन नहीं मानता और उन्हें बाँधना चाहता है। कृष्ण विराट रूप दिखाते हैं।
4. चतुर्थ सर्ग: इन्द्र ब्राह्मण बनकर कर्ण से कवच-कुण्डल दान में ले जाते हैं।
5. पंचम सर्ग: कुन्ती कर्ण को उसका जन्म-रहस्य बताकर पाण्डवों के पक्ष में बुलाती हैं। कर्ण मना कर देता है और वचन देता है कि अर्जुन को छोड़ किसी पाण्डव को नहीं मारेगा।
6. षष्ठ सर्ग: कर्ण भीष्म से आशीर्वाद लेकर युद्ध में उतरता है और घटोत्कच के संहार से कौरव-सेना को बचाने के लिए उस पर एकघ्नी शक्ति चला देता है।
7. सप्तम सर्ग: रथ का पहिया धँसने पर अर्जुन के बाण से कर्ण वीरगति पाता है।
निष्कर्ष:
काव्य दिखाता है कि मनुष्य की महानता जन्म से नहीं, कर्म और गुणों से बनती है।