Question:

यदा अयं षोडशवर्षदेशीयः आसीत् तदास्य कनीयसी भगिनी - विषूचिकया पञ्चत्वं गता । वर्षत्रयानन्तरमस्य पितृव्योऽपि दिवंगतः । द्वयोरनयो मृत्युं दृष्ट्वा आसीदस्य मनसि - कथमहं कथं वायं लोकः मृत्युभयात् मुक्तः स्यादिति चिन्तयतः एवास्य हृदि सहसैव वैराग्यप्रदीपः प्रज्वलितः । एकस्मिन् दिवसे अस्तगते भगवति भास्वति मूलशङ्करः गृहमत्यजत् ।

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यह संस्कृत गद्यांश महापुरुषों के वैराग्य और संन्यास की प्रेरणा को दर्शाता है, जो आत्मज्ञान और मोक्ष की ओर अग्रसर होने की भावना को प्रकट करता है।
Updated On: Nov 14, 2025
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Solution and Explanation

जब यह बालक सोलह वर्ष का था, तब इसकी छोटी बहन हैजा (विषूचिका) से पीड़ित होकर इस संसार से विदा हो गई। तीन वर्षों के बाद इसके चाचा (पितृव्य) भी दिवंगत हो गए। इन दोनों की मृत्यु देखकर इसके मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं और यह समस्त संसार मृत्यु के भय से मुक्त कैसे हो सकते हैं? इसी चिंतन के दौरान इसके हृदय में वैराग्य (संन्यास) की ज्योति प्रज्वलित हो उठी। एक दिन जब सूर्य अस्त हो गया, तब मूलशंकर ने अपना घर त्याग दिया।
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