श्लेष अलंकार:
जिसमें एक ही शब्द के एकाधिक अर्थों का प्रयोग करके काव्य में विशेष सौंदर्य उत्पन्न किया जाता है, उसे श्लेष अलंकार कहते हैं। इसमें शब्दों की पुनरुक्ति नहीं होती, किंतु उनके एक से अधिक अर्थ ग्रहण किए जा सकते हैं।
उदाहरण:
सानी सानी गिरधारी को सानी।
(यहाँ 'सानी' शब्द के दो अर्थ हैं - 'समान' और 'चारा'। गिरधारी भगवान श्रीकृष्ण का नाम भी है और यहाँ उनके अद्वितीय होने का संकेत किया गया है।)
उत्प्रेक्षा अलंकार:
जब किसी वस्तु, व्यक्ति या स्थिति की उपमा इस प्रकार दी जाए कि उसमें कल्पना का अधिक प्रभाव हो और ऐसा प्रतीत हो कि वह वस्तु या व्यक्ति वास्तव में वैसा ही है, तो उसे उत्प्रेक्षा अलंकार कहते हैं। इसमें 'मानो', 'जैसे', 'लगे', 'प्रतीत हो' आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है।
उदाहरण:
सुरसरिता सम मंजु मृदु बानी।
(यहाँ वाणी को गंगा के समान कोमल और मधुर बताया गया है, मानो वह वास्तव में गंगा ही हो।)