चरण 1: रूपरेखा:
1. प्रस्तावना
2. कृषि-क्रान्ति का अर्थ और आरम्भ
3. क्रान्ति के प्रमुख साधन
4. उपलब्धियाँ
5. समस्याएँ
6. समाधान
7. उपसंहार
चरण 2: निबन्ध, भारत में कृषि-क्रान्ति:
प्रस्तावना:
भारत गाँवों का देश है और आज भी देश की बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है। स्वतन्त्रता के समय हमारा देश अनाज के लिए विदेशों का मुँह देखता था। पुराने ढंग की खेती, वर्षा पर निर्भरता और कम उपज के कारण अकाल का भय बना रहता था। इस संकट से निकलने के लिए खेती के तरीकों में जो बड़ा बदलाव आया, उसे कृषि-क्रान्ति कहा जाता है।
कृषि-क्रान्ति का अर्थ और आरम्भ:
कृषि-क्रान्ति का अर्थ है खेती में आधुनिक विज्ञान और तकनीक का प्रयोग करके उत्पादन को कई गुना बढ़ा देना। सन् 1966-67 के आसपास देश में इसकी शुरुआत हुई, जिसे हरित क्रान्ति कहते हैं। इसमें कृषि-वैज्ञानिक डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन का योगदान विशेष माना जाता है। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश इसके मुख्य क्षेत्र रहे।
क्रान्ति के प्रमुख साधन:
इस क्रान्ति की नींव कई बातों पर टिकी थी। अधिक उपज देने वाले उन्नत बीज, रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाएँ किसानों को उपलब्ध कराई गईं। सिंचाई के लिए नहरें, नलकूप और बाँध बनाए गए। ट्रैक्टर, थ्रेशर और हार्वेस्टर जैसे यंत्रों से खेती का काम आसान और तेज हो गया। सरकार ने किसानों को सस्ता ऋण, फसल का समर्थन मूल्य और भण्डारण की सुविधा भी दी।
उपलब्धियाँ:
कृषि-क्रान्ति से गेहूँ और चावल का उत्पादन बहुत बढ़ा। स्वतन्त्रता के समय अनाज का उत्पादन लगभग 5 करोड़ टन था, जो आज 30 करोड़ टन से अधिक हो चुका है। भारत अनाज का आयात करने वाला देश न रहकर निर्यात भी करने लगा। किसानों की आय बढ़ी, गाँवों में रोजगार के अवसर मिले और जीवन-स्तर सुधरा। दूध के क्षेत्र में श्वेत क्रान्ति ने भी पशुपालकों को सहारा दिया।
समस्याएँ:
इस क्रान्ति के कुछ दुष्परिणाम भी सामने आए। रासायनिक खाद के अधिक प्रयोग से भूमि की उर्वरता घटी और भूजल नीचे चला गया। इसका लाभ बड़े किसानों को अधिक मिला, जबकि छोटे किसान पीछे रह गए। आज भी बहुत-से खेत केवल मानसून के भरोसे हैं।
समाधान:
इन समस्याओं के लिए जैविक खेती, ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई, मिट्टी की जाँच, फसल बीमा और किसानों के प्रशिक्षण पर ध्यान देना होगा। दलहन और तिलहन की खेती को भी बढ़ावा देना चाहिए।
उपसंहार:
कृषि-क्रान्ति ने भारत को भूख के भय से मुक्त किया और आत्मनिर्भरता की राह दिखाई। अब आवश्यकता है कि विज्ञान और परम्परा का संतुलन बनाकर धरती की सेहत भी बचाई जाए। तभी हमारा अन्नदाता सुखी रहेगा और देश सच्चे अर्थों में समृद्ध होगा।
निष्कर्ष:
खेती का विकास ही देश के विकास की जड़ है, इसलिए कृषि-क्रान्ति को टिकाऊ रूप देना हम सबका दायित्व है।