चरण 1: निबन्ध की रूपरेखा:
1. प्रस्तावना
2. परोपकार का अर्थ
3. प्रकृति में परोपकार
4. भारतीय परम्परा के उदाहरण
5. आज के जीवन में महत्त्व
6. परोपकार के लाभ और सावधानी
7. उपसंहार
चरण 2: निबन्ध: परोपकार-सर्वोच्च भावना:
प्रस्तावना
मनुष्य को अन्य प्राणियों से अलग करने वाला सबसे बड़ा गुण दूसरों के दुख को अपना समझना है। अपने लिए तो पशु-पक्षी भी जीते हैं, पर जो दूसरों के हित के लिए जिए, वही सच्चा मनुष्य है। इसी भावना को परोपकार कहते हैं। इसीलिए इसे सर्वोच्च भावना माना गया है।
परोपकार का अर्थ
परोपकार शब्द ‘पर’ और ‘उपकार’ से बना है। इसका अर्थ है बिना किसी स्वार्थ के दूसरों की भलाई करना। भूखे को भोजन देना, रोगी की सेवा करना, अनजान को रास्ता बताना और संकट में पड़े की सहायता करना, ये सब परोपकार के ही रूप हैं।
प्रकृति में परोपकार
प्रकृति हमें परोपकार का पहला पाठ पढ़ाती है। नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीतीं, वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते, बादल अपने लिए नहीं बरसते और सूर्य बिना भेदभाव सबको प्रकाश देता है। रहीम ने कहा है:
तरुवर फल नहिं खात हैं, सरवर पियहिं न पान।
कहि रहीम परकाज हित, संपति सँचहिं सुजान॥
भारतीय परम्परा के उदाहरण
हमारे इतिहास में परोपकार के अनेक उदाहरण हैं। महर्षि दधीचि ने देवताओं की रक्षा के लिए अपनी अस्थियाँ दान कर दीं, जिनसे वज्र बना। राजा शिबि ने शरण में आए कबूतर को बचाने के लिए अपने शरीर का मांस दे दिया। तुलसीदास जी कहते हैं:
परहित सरिस धर्म नहिं भाई।
परपीड़ा सम नहिं अधमाई॥
आज के जीवन में महत्त्व
आज के स्वार्थ भरे युग में परोपकार की आवश्यकता और बढ़ गई है। बाढ़, भूकम्प या महामारी जैसे संकट में जब लोग एक-दूसरे की सहायता के लिए आगे आते हैं, तब समाज की सच्ची शक्ति दिखती है। रक्तदान, नेत्रदान, निर्धन बच्चों को पढ़ाना और पेड़ लगाना भी परोपकार ही हैं।
परोपकार के लाभ और सावधानी
परोपकार से केवल पाने वाले का भला नहीं होता, करने वाले को भी सुख मिलता है। इससे मन में सन्तोष और आत्मबल बढ़ता है, समाज में प्रेम और भाईचारा फैलता है तथा स्वार्थ, ईर्ष्या और घृणा जैसे दोष दूर होते हैं। परोपकार दिखावे के लिए नहीं, सच्चे मन से होना चाहिए। दान करके उसका प्रचार करना परोपकार को छोटा कर देता है।
उपसंहार
परोपकार ही मानवता की पहचान है। मैथिलीशरण गुप्त ने कहा है: वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे। हमें अपनी शक्ति के अनुसार प्रतिदिन किसी न किसी की भलाई करनी चाहिए। यदि सब लोग यह भावना अपना लें, तो समाज सुखी और सशक्त बनेगा।
निष्कर्ष:
परोपकार से व्यक्ति को शान्ति मिलती है और समाज को मजबूती, इसलिए यह सर्वोच्च भावना है।